हरियाणा, आसान डगर नहीं है भाजपा के लिए

सिरसा(प्रैसवार्ता)। हरियाणवी मतदाताओं की सीढ़ी पर चढ़कर भाजपा स्पष्ट बहुमत लेकर हरियाणा में सरकार तो बना चुकी है, मगर उसकी डगर आसान नजर नहीं आ रही। भाजपा में सहयोगी दलों के साथ सत्ता में भागीदारी तो तीन बार रह चुकी है और तीनों ही बार, जो अनुभव भाजपा को मिला है, उसके परिणाम सुखद नहीं रहे। भाजपा कभी इनैलो के बाय अंग बैठी, तो कभी हविपा की बैसाखी बनी, परंतु सुहागिन होते हुए भी, जब तक सत्ता में रही, विधवा का चोला पहनकर ही बैठना पड़ा। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में हरियाणा मोदी लहर से अछूता नहीं रहा। भाजपा को दस संसदीय क्षेत्रों वाले हरियाणा में सात संसदीय क्षेत्रों में विजयी परचम लहराने का अवसर मिला। हरियाणवी मतदाताओं ने विधानसभा चुनाव में गैर जाट राजनीति पर स्वीकृति की मोहर लगाकर पंजाबी समुदाय के मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री पद की कुर्सी सौंपकर स्व. डॉ. मंगलसेन के स्वप्र को पूरा कर दिया। डॉ.मंगल सेन की सोच रही थी कि हरियाणा का मुख्यमंत्री पंजाबी समाज का हो। भाजपा मोदी लहर व गैर जाटों की बदौलत सत्ता हासिल करने में तो सफल हो गई है, मगर यह विजयी पताका भाजपा के लिए किसी दोधारी तलवार से कम नहीं है, जिस पर चलने के लिए भाजपा को कड़ी अग्रि परीक्षा से गुजरना होगा, क्योंकि हरियाणा में, जहां भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, जातिवाद तथा परिवारवाद भारी रहा है, वहीं कानून व्यवस्था व अपराधियों के आतंक से प्र्रदेशवासी स्वयं को असुरक्षित मानते है। अपराध देश के किसी भी क्षेत्र में हो, मगर उसमें हरियाणा की भागीदारी का होना अक्सर पाया गया है। नई सरकार का पुरानी सरकार की घोषणाओं पर लगाया गया ''ब्रेक" कानूनी दांवपेचों में उलझा सकता है। प्रदेशवासी शांतप्रिय तथा सुखद माहौल चाहते है। जाट बाहुल्य हरियाणा में भाजपा की सत्ता को कांटी से कम नहीं आंका जा सकता, जिसके लिए भाजपा को फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा। पिछले एक दशक से प्रदेश में ''चौधर" की डुगडुगी बजती आ रही मौजूदा परिस्थितियों में गैर जाटों की सरकार को सहन करने के लिए क्या जाट तैयार होंगे, कई प्रश्र चिन्ह अंकित करता है। हरियाणा में जाट मतदाता का समर्थन व विरोध जग-जाहिर है, जिसकी पुष्टि हरियाणवी राजनीति का इतिहास भी करता है। पहले गैर जाट मुख्यमंत्री भगवत दयाल शर्मा की सरकार जाटों की बदौलत तेरहवें दिन ही चलती बनी थी। राव वीरेंद्र सिंह को आरंभ में तो जाटों का समर्थन था, मगर एक महीने बाद ही मोहभंग हो गया था। भजनलाल ने भी स्वयं के परिवार को बिश्रोई भादू जाट बताकर जाटों में सेंधमारी का प्रयास किया, मगर वह सफल नहीं हो सके। प्रदेश के जाट मतदाता ''चौधरÓÓ के जाने से संतुष्ट नहीं देखे जा रहे, हालांकि रोहतक की ''चौधर" रोहतक के पास रहने की तसल्ली जरूर पाले हुए है। जाटों की सरकार को सत्ता  से दूर करने के लिए जाट वोटरों ने भाजपा पर विश्वास बनाया है, मगर यह विश्वास कब तक रह पाएगा, इस प्रश्र का उत्तर प्रश्र के गर्भ में है। गैर जाटों  ने थोक के भाव में भाजपा को वोट दिए, क्योंकि गैर जाटों की यह धारणा बन गई थी, कि हरियाणा में जाट मुख्यमंत्री बनते रहे है, जिस कारण गैर जाटों को हरियाणा में भैंस के साथ चीचड़ की तरह देखा जाता है। राज्य में गैर जाट मतदाता का रूझान कांग्रेस की तरफ रहा है, जिसे हजकां प्रमुख कुलदीप बिश्रोई ने कांग्रेस से अलविदाई लेकर अपने साथ तो जोड़ा था, जो भाजपा के हाईजैक की चपेट में आ गया। भाजपा को प्रदेश में गैर जाटों की पार्टी के रूप में देखा जा रहा है, मगर भाजपा के कम जनाधार की वजह  से गैर जाट कांग्रेस के समर्थक रहे है। जाट कभी भाजपा के  समर्थक नहीं रहे, क्योंकि प्रदेश भाजपा में किशन सिंह सांगवान से पहले कोई प्रभावशाली जाट नेता भाजपा में था और उन्हें भी इनैलो ने भाजपा को गोद देकर जाट बैलट में कमल खिलाने में सहयोग दिया था। इसलिए जाट भाजपा को कांग्रेस का विकल्प मानने को तैयार नहीं था, जिस कारण वह कभी कांग्रेस, तो कभी इनैलो को समर्थन देेता रहा। विधानसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते जाट लैंड में कांग्रेस 14 में से 10 सीटों पर सफल हुई है, जबकि अन्य जिलों के चुनाव परिणाम से सहज ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि गैर जाट बैल्ट में इनैलो के साथ साथ कांग्रेस का भी सफाया हो गया और मतदाताओं ने भाजपा को कांग्रेस के विकल्प के तौर पर स्वीकार कर लिया। भाजपा के लिए जाटों को विश्वास में लेना तथा गैर जाटों पर विश्वास बनाए रखना होगा। कांग्रेस द्वारा जाटों को आरक्षण देने से गैर जाटों की नाराजगी कांग्रेस पर भारी पड़ी, जिसका फायदा भाजपा को मिला। भाजपाई दिग्गज स्व. डा. मंगलसेन के निधन के बाद मजबूत नेतृत्व न मिलने की वजह से पंजाबी समुदाय कांग्रेसी हो गया, हालांकि उनकी पहली पसंद भाजपा थी, मगर प्रदेश भाजपा कभी देवीलाल, कभी चौटाला तथा कभी बंसीलाल की सीढ़ी बनती रही। लोकसभा चुनाव के बाद पंजाबी समुदाय की सोच में बदलाव आया और उसने भाजपाई ध्वज की तरफ कदम बढ़ा दिए।  राज्य का पंजाबी वर्ग आर्थिक रूप से मजबूत तथा राजनीतिक तौर पर काफी कमजोर था, मगर पंजाबी समुदाय की युवा टीम में लंबे समय से हरियाणा के राजनीतिक मानचित्र में बदलाव लाने की इच्छाएं थी, जो विधानसभा चुनाव ने पूरी कर दी है। भाजपा में कांग्रेसी कल्चर की अनदेखी की जा  सकती, क्योंकि भाजपा में कांग्रेस के लोगों की भीड़ है, जो कांग्रेसी कल्चर पैदा कर सकते है, क्योंकि उन्होंने पार्टी ही बदली है, कल्चर, आदत या सोच नहीं।

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