क्षेत्रीय दलों के राजनीतिक भविष्य पर प्रश्र चिन्ह

सिरसा(प्रैसवार्ता)। महाराष्ट्र तथा हरियाणा विधानसभा चुनाव में भाजपाई ध्वज फहराने के साथ ही क्षेत्रीय दलों पर संकट के बादल मंडराने लगे है। झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा तथा जम्मू कश्मीर में नैशनल कांफ्रेंस का राजनीतिक भविष्य दाव पर लग गया है, जहां चुनावी डुगडुगी बज चुकी है। देश के बदलते मानचित्र से संकेत मिलते है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी तथा पंजाब में शिरोमणी अकाली दल भी सकते में है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल और तामिलनाडू में भाजपा का प्रभाव प्रदर्शन क्षेत्रीय दलों के खतरे की घंटी के रूप में देखा जाने लगा है। देश में नए, तेजी से मध्यवर्ग में बदलते और आशाओं के अरमानों से लबालब युवा भारत के लिए अप्रासंगिक होती जा रही कांग्रेस से छुटकारा पाने के लिए मोदी-शाह की जोड़ी का रणघोष दरअसल उस विशाल मतदाता वर्ग की भावनाओं की ही अभिव्यक्ति है, जिसे भारत की कांग्रेस-आधिपत्य वाली राजनीति के घिसे पिटे मुहावरे बहुत अपील नहीं करते। इसलिए भाजपा की चुनावी रणनीति का पहला और स्वाभाविक लक्ष्य वह दुर्ग ढहाना है, जो अपने बोझ तले चरमरा रहा है। मोदी-शाह जोड़ी कांग्रेस से मुक्ति का लक्ष्य तब तक पूरा नहीं कर सकती, जब तक फर्जी स्थानीय अस्मिताओं की भावनाओं की सवारी गांठकर राज्यों की सत्ता में काबिज होने वाली क्षेत्रीय पार्टियों से भी छुटकारा न पा लिया जाए, क्योंकि इनमें से कई क्षेत्रीय दलों की ताकत ने कांग्रेस को न केवल केंद्र में सत्ता की संजीवनी  मिलती रही है, बल्कि इनमें से कुछ उसी की कोख से ही पैदा हुई है। केंद्र तथा उसकी परिधि दोनों को ही नगण्य किए बगैर भाजपा ''सबका साथ, सबका विकास" के एजेन्डे को शायद ही पूरा कर पाए। भाजपा के ''सबका साथ" में अधिक दवाब समाज के उस भाग पर है, जो उसका या तो परंपरागत समर्थक नहीं है या फिर उससे दूरी बनाए हुए है। लोकसभा चुनाव में बसपा के दलित वोटों और बिहार में महादलित तथा छोटी ओबीसी जाति वर्गा का भाजपा की तरफ रूझान कुछ ओर ही संकेत देता है, लेकिन कांग्रेस संस्कृति से इतर उग्र क्षेत्रीय या जातीय अस्मिता वाली शिव सेना, इनैलो जैसे क्षेत्रीय दलों को नकेल डालने के लिए ज्यादा आक्रामक रणनीति बनानी होगी। महाराष्ट्र में शिव सेना से गठबंधन तोडऩे की सोची-समझी योजना पर जोखिम उठाने का श्रेय वर्तमान राज्य-केंद्र भाजपाई शीर्ष नेतृत्व को दिया जा रहा हो, मगर महाराष्ट्र भाजपा में बाला साहेब ठाकरे के जीवित रहते ही इसकी संभावनाएं तलाशी जाती रही थी। भाजपा ने विदर्भ और उत्तर महाराष्ट्र में अपना आधार बाला साहेब के रहते ही मजबूत किया, तब पार्टी के पास बहुमत की ताकत नहीं थी। केंद्र में अपने दम पर बहुमत और लंबे अरसे बाद मोदी जैसा नेता आते ही भाजपा क्षेत्रीय दलों की सियासी ठेकेदारी पर लगाम लगाने में जुट गई। हरियाणा में तो पिछले एक दशक से लड़ते हुए भाजपा ने जीटी रोड दल की तोहमत से छुटकारा पाने के लिए सभी क्षेत्रों और सभी वर्गों में अपना जनाधार बढ़ाने की मुहिम चलाई। दूसरे दलों के लिए प्रभावी हलके या जातिगत नेताओं से सजी इस सेना की मोदी जैसी महारथी की जरूरत थी। क्षेत्रीय और जातीय अस्मिताओं के दिखावटी तेवर समाज के हर वर्ग के युवा मतदाता के लिए बेमानी होते जा रहे है, जिसे न तो शिव सेना समझ सकी और न ही महाराष्ट्र निर्माण सेना। शरद पवार और उद्भव ठाकरे के प्रचार के दौरान ही अंदाजा हो गया था कि भाजपा क्षेत्रीय अस्मिता के सिक्के को खोटा साबित करने पर उतारू है। उधर नरेंद्र मोदी हर जनसभा में अपनी यह टेक दोहराते रहे है कि ''न प्रांतवाद, न जातिवाद, न भाषावाद, सिर्फ विकासवाद।" यह ऐसा अस्त्र है, जिसका तोड़ पुराने खांचों तक सीमित क्षेत्रीय-दलों को ढूंढना मुश्किल है, जिनकी सारी राजनीति कुछ जाति-वर्गों के गठजोड़ और पार्टी प्रमुख के वंश के आधार पर चलती रही है और जिन्हें केंद्र में लूली-लंगड़ी  सरकारों को समर्थन के ऐवज में अभयदान मिलता रहा है। पिछले तीन-साढे तीन दशकों से यह राजनीति काफी परवान चढ़ी, मगर इससे देश के प्रमुख राज्यों में सर्वागीण विकास को ग्रहण लगा। उत्तर और दक्षिण भारत के प्रमुख क्षेत्रीय दलों के कार्यकर्ताओं के भ्रष्टाचार के किस्सों से लोग आजिज थे। महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा की अकेले दम सफलता से ऐसे क्षेत्रीय दलों में घबराहट का फैलना जरूरी है। झारखंड, बिहार और यूपी के विधानसभा चुनाव भाजपा का अगला निशाना होंगे, जहां भाजपा सत्ता की गूंज सूंध रही है। वर्ष 2016 में असम, 2017 में पंजाब में भी दांव खेलने के लिए भाजपा ने तैयारी शुरू कर दी है। पश्चिमी बंगाल में ममता बनर्जी भाजपा के लिए अप्रत्याशित उभार से अभी से हलकान है। भाजपा के बढ़ते प्रभाव का असर ही है, कि माकपा तक सीमावर्ती जिलों में आए बंगला देशियों में से हिंदूओं को ''धार्मिक उन्माद" के शिकार मानकर उनके प्रति अलग रवैया अपनाने की बात कहने पर विवश है। ऐसे में भाजपा क्षेत्रीय दलों के एजेन्डा की पोल खोलकर अपना एजेन्डा तय कर सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी सभ्भाओं में उठाए गए मुद्दों और आश्वासनों पर आधा भी अमल कर सके, तो भाजपा वंश अधारित क्षेत्रीय दलों को हाशिए पर ले जाकर सबल और संपूर्ण राष्ट्रीय राजनीति की शुरूआत करने में सफल हो सकती है। 

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