गहरी होती जा रही है पत्रकार-पब्लिक-पुलिस व प्रशासन के बीच की खाई

पत्रकारों के लिए नवम्बर के माह को अच्छे माह के रूप में नहीं गिना जा सकता। इसमें प्रशासन पुलिस व सरकार की संवादहीनता की लकवाग्रस्त व्यवस्था उभर कर सामने आती है। घटना रामपाल प्रकरण में पत्रकारों से मारपीट की दुर्व्यवहार की बात की जाए, बात सिरसा के पत्रकार रामेश्वरी को एक ठेकदार से विवाद में जान से मारने की धमकी के बाद प्रशासन की निष्क्रियता की जाए या फिर बात करे हरियाणा के पड़ोस लगते राज्य पंजाब के अमृतसर में ट्रेफिक पुलिस द्वारा पुलिसगीरी की बात की जाए सब एक ही ओर इशारा कर रहे है पत्रकार को लोकतन्त्र का चौथा खम्भा मंचीय भाषणों भर में ही रह गया है। इसके अलावा जब भी मौका मिलता है। पत्रकारों की खातिरदारी में कोई कमी नहीं छोडी जाती उक्त तीनों की घटनाओं में जब तक पत्रकार धरने-प्रदर्शन पर नहीं उतरे तब तक उनकी गैर-खबर भी नहीं ली गई। इस तरह की घटनाओं की पुर्नावरती ना हो इसकों लेकर किसी भी ठोस योजना का गहरा अभाव है। पत्रकारों से सम्र्पक साधनों को बने लोक सम्र्पक विभाग प्रशासनिक गलियारों से ही मुक्त हो पाते की वो पत्रकारों के हित की किसी योजना पर काम करे। होना ये चाहिए कि समय-समय पर पब्लिक-पुलिस-प्रशासन व पत्रकार यूनियनों के विचार मंच सांझे हो जहां पर विभिन्न आन्दोलनों अन्य खोजबीन की खबरों, जनसमस्यों के समय आने वाला सभी समस्याओं पर सभी तबके अपनी बात रखे वही पत्रकार भी अपनी पीड़ा सबसे साझी कर सके कि इस व्यापारीकरण,राजनीतीकरण व भाई-भतीजा वाद के युग में उसे किन-किन समस्याओं से दो-चार होते हुए अपना काम करना पड रहा है। अफसोस ये है कि इस विषय पर पुलिस प्रशासन पब्लिक के साथ पत्रकार भी विकेक शून्य स्थित में है। पत्रकार विचार गोष्ठियां अन्य मंच अपने उददेश्य के करीब  पहुचने से पहले ही दम तोड देती है। ऐसे समय में सिरसा में आयोजित छत्रपति स्मृति समारोह एक सुखद बहार है। अगर समय रहते स्थिती को नहीं सम्भाला तो भविष्य में ओर बुरे दिन भी समाज को देखने पड सकते है।(नवल सिंह, प्रैसवार्ता)

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