देशभक्त की फिल्म देश में नहीं हो पाई प्रदर्शित

आजादी के संघर्ष में शहीद उधम ङ्क्षसह का अधिकतर समय गुमनामी में गुजरा जिसके बारे में जब भी कोई नई जानकारी मिलती है तो मन होता है उसे सभी से सांझा किया जाए इसी तरह की एक जानकारी एक लेख में मिली।  एक अंग्रेजी  दैनिक पत्र समाचारमें बलवन्त ङ्क्षसह द्वारा लिखित लेख में दी गई जानकारी बेहद महत्वपुर्ण है। उन्होंने अपने अध्यन्न के दौरान खुलासा किया कि उधम ङ्क्षसह ने दो चर्चित फिल्मों में काम किया जिसकी आमदन को उन्होंने गदर पार्टी को दे दिया ताकि भारत देश की आजादी की लड़ाई को तेज किया जा सके । इसके साथ ही उन्होंने एक अन्य चौकाने वाली जानकारी दी कि उधम ङ्क्षसह ने 48 दिन की लम्बी भुख हड़ताल भी की थी। बलवन्त ङ्क्षसह अपने लेख में लिखते है कि रॉग फ्रिकिं ग ब्रिटिश लेखक ने इसे अपनी पुस्तक में लिखा है कि माईकल ओ डायर को गोली मारने से तीन साल पहले उन्होंने दो इग्लिश फिल्मों में अभिनय किया जिसमें पहली अलिफेट बॉय-1937 और दूसरी फोर फेदर-1939 है। बेहद खास बात ये रही कि इन फिल्मों से प्राप्त आमदन को उधम ङ्क्षसह ने गदर पार्टी को समर्पित कर दिया।  फिल्मों का निर्देशन व निर्माण एलेकजैन्डर कोरडा व उनके छोटे भाई जोलटन कोरडा ने किया जो उस समय के प्रसिद्ध निर्माता थे। रॉग फ्रिकिं ग एक प्रसिद्ध ब्रिटिश लेखक है जिन्होंने पहली बार इस तथ्य से अपनी पुस्तक -द अमतृसर लिगसी- 1989 में लिखा है। रॉग लिखते है कि लंदन में गदर पार्टी के पास अपनी गतिविधियां चलाने के लिए फंड का अभाव था। उधम ङ्क्षसह ने नॉन-युरोपियन इक्सट्रा अभिनेता के तौर पर दो फिल्मों में काम किया था। जिससे प्राप्त आमदन को गदर पार्टी का दे दिया गया।
ऐलिफेन्ट बॉय एक बिट्रिश एडवेंचर फिल्म टूमल ऑफ ऐलिफन्ट -जंगल बुक, पुस्तक जिसे रूडयार्ड
नवल सिंह
किपलिंग द्वारा लिखत पुस्तक पर अधारित है। यह फिल्म सोशल नेटवर्क साईट यू टयूब पर भी उपलब्ध है। फिल्म को लंदन फिल्म स्टूडियों डेनम और मंसूर में फिल्माया गया। फिल्म को 14 देशों में 9अप्रैल 1937 को  रिलिज की गई। पर यह फिल्म कभी भी भारत में पदर्शित नहंी की गई। फिल्म ने बेहतर निर्देशन के लिए विनिस फिल्म फेसटिवल में अवार्ड को भी जीता।
इस तरह से उधम सिंह की लम्बी भुखहड़ताल का जिक्र करते हुए भारतीय रेलवे में सिनियर इंजिनियर के पद पर कार्यरत राकेश कुमार ने अपनी पुस्तक आजादी दी शंमा दा परवाना-महान गदरी इंकलाबी शहीद उधम ङ्क्षसह में कुछ अलग तथ्यों से परिचित करवाया है। बिट्रिश दस्तावेजों को आधार बना राकेश कुमार लिखते है कि उधम ङ्क्षसह ने क्रिसटन हॉल में 13मार्च 1940 को माईकल-ओ-डायर को केवल जलियावाला बांग के लिए दोषी करार कर गोली नहीं मारी थी ब्लकि लम्बे समय तक पंजाब में अंग्रेजी शासन व्यवस्था से उधम ङ्क्षसह व्यधित थे। यह अंग्रेजी शासन व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह था। 
बिट्रिश दस्तावेज बताते है कि माईकल ओ डायर को  मारने से 13साल पहले उधम ङ्क्षसह को 30अगस्त 1927 में उन्हें पिस्तोल व गदर की गुंज पुस्तक की प्रतियां को रखने के आरोप में गिरफतार किया गया था। जिसमें उनपर सेक्शन-20 ऑफ द आर्म एक्ट और पांच साल की सजा दी गई। गदर डायेक्टरी में जिसे डायेक्टर विजिलेंस ब्यूरों होम डिर्पाटमेंट इण्डिया ने 1934 में लिखा है कि भारत में गदर पार्टी के आन्दोलन को जिन्होंने चलाया व भागेदारी की उसमें उधम ङ्क्षसह का नाम पेज 267 एस-44 पर है। राकेश कुमार दस्तावेज पर आधारित इस जानकारी को 1994 सामने लाए। 31 जुलाई 1940 को फांसी पर चढाए जाने से पहले बिट्रिश सरकार ने दस्तावेज में बताया कि उधम ङ्क्षसह ने लगातार 42 दिनों की भुख हड़ताल 1940 में की थी। 
साम्प्रदायिकता के इस महौल में उनके बारे में उनकी अन्तिम वसियत का जिक्र करना बेहद महत्पुर्ण है प्रसिद्ध लेखक प्रो.जगमोहन ने एक कार्यक्रम के दौरान मुझसे किसी विषय पर चर्चा के दौरान कहा था कि उधम सिंह ने जात-बिरादरी से ऊपर उठ कर अपने फांसी चढने से पुर्व खुद को नया नाम राम महोमद सिंह आजाद दिया व कहा कि मुझे भविष्य में इसी नाम से पुकारा जाना चाहिए। उसके बाद मैं तो अपने स्तर पर हर उधम सिंह के विषय में लिखे लेख या किसी मंच पर मौका मिले तो इस बात का जिक्र जरूर करता हँू। अगर आप भी ऐसा ही करेगे तो निश्चित है उनकी यह अनुठी वसीयत साम्प्रदायिकता को जड़ को उखाडऩे का माहौल पैदा करेगी।(नवल सिंह, प्रैसवार्ता)

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