आखिर कब तक जिस्म बेचती रहेंगी हिन्दुस्तानी महिलाएं ?

वेश्यावृत्ति एक ऐसा विषय है जिसपर लोग खुलकर बात करने से संकुचाते हैं जबकि यह आदिकाल से सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ-साथ तेजी से पनपी एक बुराई है जो आज भी सारे विश्व में जारी है। हाँ यह बात अलग है कि आधुनिक समाज में वेश्यावृत्ति को अलग-अलग नामों और रूपों में जाना जाता रहा है। यह विश्व के बहुत ही प्राचीनतम धंधों में से एक है। इंडिया में पहले इन्हें गणिका के नाम से पुकारा जाता था। हमारे प्राचीन भारतीय साहित्य में इसका विस्तृत वर्णन भी देखा जा सकता है। हमारे यहाँ मौजूद देवदासी प्रथा और सामंती युग में गुलामों के रूप में खरीद-फरोख़्त तक वेश्यावृति का प्रचलन रहा था। एक युग में वेश्याओं को संपदा और शक्ति का प्रतीक माना जाने लगा था। यह वह दौर था जब नारी को विलासिता की वस्तु मानकर और कामुकता की कठपुतली समझकर अपनी अंगुलियों से जब जैसे चाहा नचाया, रस निचोड़ा और झूठन समझकर फेंक दिया। अंग्रेजों के भारत में आगमन के बाद तो इस कुप्रथा ने धंधे का स्वरूप धारण किया और वेश्यालय बनने लगे। आज कच्चे कोठों से निकल कर देह व्यापार मसाज पार्लरों, इन्टरनेट के माध्यम से एस्कार्ट सर्विस तक खूब फल-फूल रहा है। गरीब देशों, जिनमें थाइलैंड, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि देश तो सेक्स पर्यटन के लिए खुल्लेतौर पर जाने जाते हैं। पर भारत भी इस मामले में कुछ कम नही है। कोई शक नही कि आज अनेक देशों की युवतियां वेश्यावृत्ति के जरिए कमाई करने के लिए भारत की ओर रूख कर रही हैं। बड़े दुःख की बात है कि गुरुओं पीर पैगम्बरों के मुल्क भारत के कई हिस्सों में वेश्यावृति को खानदानी पेशा तक माना जाता है। एक एनजीओ की अध्ययन रिपोर्ट की मानें तो मध्यप्रदेश और राजस्थान के एक क्षेत्र में एक अति निर्धन जाति के लगभग 200 से ज्यादा गांवो में लड़की को उसके जवान होने से पहले ही खुद उसके मां बाप की तरफ से ही वेश्यावृत्ति के लिए प्रेरित किया जाता है। उनकी जिस्मफरोशी के लिए दिन रात और हफ्तों हफ्तों के लिये बोली लगती है। और इस प्रकार लगभग हर लड़की इस दलदल में फंसकर रह जाती है। विकास के लाखों दावे ठोकने वाले गुजरात के सराणिया समुदाय के लोग लड़की के जवान होने पर भी स्वयं उसके परिजन ही वेश्यावृति करवाते हैं। कहा जाता है कि रजवाड़ों के समय सराणिया युवतियां युद्ध में सैनिकों और सेनापतियों के लिए मनोरंजन का माध्यम हुआ करती थीं। नाच-गाने के अतिरिक्त सेनापतियों और मुख्य सैनिकों की हवस को शांत करने के लिए वे स्वयं को प्रस्तुत करती थी। बहुत ही आश्चर्य है कि आज न रजवाड़े रहे और न ही अराजकता लेकिन यह समुदाय इस दलदल से निकल नहीं सका है। बताया जाता है कि देश की आजादी के बाद सरकार ने इन्हें भूमि उपलब्ध करायी ताकि वे खेती आदि करके अपना जीवन यापन कर सके लेकिन आसानी से पैसा कमाने की प्रवृत्ति कुछ लोगों में घर कर गई उसी का परिणाम है कि यह कुप्रथा आज भी जारी है। हाँ सरकार और कुछ सामाजिक संस्थाओं की सजगता के कारण अब यह सब खुलेआम नहीं होता। ऐसे भी केस देखने में आए हैं जिसमें झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और उत्तरांचल में 12 से 15 वर्ष की कम उम्र की लड़कियों को भी वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से सटे जिले के एक गांव में तो वेश्यावृत्ति को जिंदगी का हिस्सा माना जाता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि वहां के लोग इसे कोई बदनामी नहीं मानते। उनके अनुसार यह सब उनकी जीवनशैली का हिस्सा है और उन्हें इस पर कोई शर्मिन्दगी नहीं है। तर्क हैं कि यहाँ पुरे गावं की अर्थव्यवस्था इसी धंधें पर टिकी है। 
                                    भारतीय कानून भी इस मामले दोगला सा प्रतीत हो रहा है। पिछले दिनों एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने अपनी एक तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि सरकार महिलाओं की तस्करी और सेक्स व्यापार पर लगाम लगाने में अक्षम हैं तो इसे क़ानूनी मान्यता क्यों नहीं दे देती। हालांकि इससे पूर्व सुप्रीम कोर्ट ओलेगा तेलिस बनाम बंबई नगर निगम मामले (1985 एसएससी-3ए 535) में फैसला सुना चुका है कि कोई भी व्यक्ति जीविका के साधन के रूप में जुआ या वेश्यावृत्ति जैसे अवैध व अनैतिक पेशे का सहारा नहीं ले सकता। कानून की बड़ी बड़ी किताबों के अनुसार भारत में अनैतिक व्यापार निषेध कानून 1956 में आया। इसके मुताबिक़ वेश्यावृत्ति का मतलब अपने व्यावसायिक धंधे के लिए लोगों का यौन शोषण है। एक परिभाषा के अनुसार ‘किसी नारी द्वारा किराया लेकर, चाहे वह पैसे के रूप में लिया गया हो या मूल्यवान वस्तु के रूप में और चाहे फौरन वसूला गया हो या किसी अवधि के बाद, हवस की आग बुझाने यानि यौन-संबंध के लिए किसी भी पुरूष को अपना शरीर सौंपना ‘वेश्यावृत्ति’ है और ऐसा करने वाली महिला को वेश्या कहा जाएगा।
                                     अन्य शब्दों में कहे तो ‘अर्थलाभ के लिए स्थापित यौनसंबंध वेश्यावृत्ति कहलाता है। इसमें उस भावनात्मक तत्व का अभाव होता है जो अधिकांश यौन संबंधों का एक प्रमुख अंग है।’ 
                                         वेश्यालय चलाने वाले, सहायता करने वाले व्यक्ति को पहले अपराध पर एक से तीन वर्ष तो, दूसरे अपराध पर 2 वर्ष से 5 वर्ष तक की सजा व 2 से 5 हजार तक जुर्माने का प्रावधान है। वेश्यावृति कार्यों के लिए मकान किराये पर या किसी और तरीके से देने वाले को भी दो वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। दूसरी बार यही अपराध करने पर पांच साल तक की सजा व जुर्माना है। किसी व्यक्ति को वेश्यावृत्ति के लिए खरीदना, लाना, लालच देना और उसको वेश्यावृत्ति के लिए ले जाना अपराध है और इसकी सजा 3 से 7 वर्ष है तो किसी को वेश्यावृत्ति में जबरन धकेलने पर आजीवन कारावास का प्रावधान है। 16 साल से कम बच्चे को खरीद-बहलाकर लाने तथा वेश्यावृत्ति की सजा भी आजीवन कारावास तक है। नाबालिग जो 16 से 18 वर्ष के बीच की आयु का है तो उसके बारे में कम से कम सात वर्ष तथा ज्यादा से ज्यादा 14 वर्ष की सजा है। वेश्यावृत्ति के लिए आम जगहों पर ग्राहकों को तलाशना, फुसलाना, प्रदर्शन करना भी अपराध है, जिसकी सजा 6 महीने तक तथा जुर्माना 500 रुपये तक है या दोनों है। 
                                       कानून बनाने और कानून का उल्लंघन करने वालों को सजा देना ही काफी नहीं है। हमारी सरकार और समाज को गम्भीरता से सोचना होगा कि घोर निर्धनता तथा सामाजिक सरोकार और सुरक्षा का न होना ही दलालों को यह अवसर प्रदान करता है कि वे छोटे-छोटे लड़के-लड़कियों को शारीरिक दुरुपयोग में धकेल देते हैं। इन्हें रोक पाने पर ही लोगों का शोषण, क्रूरता बंद होगी और वे एक सही और उचित जिंदगी जी पाएंगे। कोई नहीं चाहता कि अपरिपक्व शरीर रोज तिल-तिल कर मरे और परिपक्व शरीर अपना अत्यधिक शोषण करवा कर अकाल ही काल का ग्रास बने। सचमुच इन लोगों की जिंदगी बड़ी छोटी और दुखदायी होती है। यह बार-बार के शोध अध्ययनों से सिद्ध हो चुका है कि  गरीबी और घरेलू हिंसा का शिकार बच्चे और स्त्रियां आसानी से इस दलदल में फंस जाते हैं। बहुत ही कड़वा सच है कि हिन्दुस्तान के कुछ गांवों में घर का खर्च चलाने के लिए बच्चों और स्त्रियों को स्वेच्छा से वेश्यावृत्ति करते पाया गया है। ज्यादातर भीख मांगते दिखते हैं लेकिन मौका लगते ही चुपके-चुपके शरीर भी बेचने की कोशिश करते हैं। कुछ सरेआम कहते देखे गये हैं कि इस काम को करने में कोई बुराई नहीं है। वे अपनी मजबूरी को ढकना चाहते हैं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक अध्ययन के मुताबिक भारत में 68 प्रतिशत लड़कियों को रोजगार के झांसे में फंसाकर वेश्यालयों के दलालों तक पहुंचाया जाता है। लगभग 17 प्रतिशत शादी के वायदे में फंसकर आती हैं। 
                                        जहाँ तक व्यवस्था की क्षमता का प्रश्न है, कानून वेश्यावृत्ति को मिटाने के प्रयास नहीं करता, बल्कि सिर्फ वेश्यालय चलाने या उसके लिए घर किराए पर देने या वेश्या के लिए दलाली करने को जुर्म की संज्ञा दे देता है। फलस्वरूप, कोई भी कानून न तो स्वेच्छा से या अकेले वेश्यावृत्ति करने पर कोई पाबंदी लगा पाता था और न ही इस व्यापार की जड़ यानी खरीददार पर। मुंबई पुलिस के एक प्रकोष्ठ शाखा के सूत्रों के अनुसार पिछले वर्षों में 469 वेश्यालयों के मालिक पकड़े गए, पर उनमें से कुल दो दंडित हुए। इनमें से एक भी दलाल या गृहस्वामी नहीं था। दूसरी तरफ इसी दौरान पकड़ी गई  4140 वेश्याओं को वेश्यावृत्ति निरोधक कानून के खंड 8(बी) के अंतर्गत हर एक को दंडित किया गया। अनैतिक गतिविधियां या संगठित देह व्यापार अपराध है लेकिन इसके लिए लगाई जाने वाली कानूनी धाराओं में कई छेद हैं और अधिकतर धाराएं जमानती है। 
                                   मुझे नहीं लगता कि कोई भी नारी स्वेच्छा से इस धंधे में कदम रखती है। उसे कुछ लोग वेश्यावृत्ति करने को मजबूर करते हैं। यह तथ्य निर्विवाद है कि एक बार इस घिनौनी दुनिया में कदम रखने के बाद इससे बाहर निकलने के सभी रास्ते लगभग बंद नज़र आते हैं। इसके लिए हम और हमारा समाज जिम्मेदार नहीं तो कौन जिम्मेवार है? शायद यही वजह है कि ये सेक्स-वर्कर इसी नर्क में रहते हुए एडस जैसे भयंकर रोग का शिकार बनने को अभिशप्त है। वे यह भी जानती हैं कि आयु के ढलने के बाद उन्हें पूछने वाला कोई नहीं होगा। ढ़लती उम्र और फिर उस पर रोग उन्हें जीते जी मौत सी यातनाएं झेलने के लिए विवश करता है। अगर इस धंधे में फंसी औरतों को जीविका के वैकल्पिक संसाधन उपलब्ध कराये जाए और उनके बच्चों की परवरिश और शिक्षा की व्यवस्था की जाए तो बहुत हद तक संभव है कुछ सुधार की आस जगे। आज जरूरत है कि हम नारी को केवल भोग विलास की वस्तु मानने की अपनी घटिया सोच को हमेशा के लिए तिलांजलि देकर समाज से इस बुराई को मिटाने में अपना योगदान दें। जिस्मफरोशी के कलंक को धोने के लिए भी एक राष्ट्रीय अभियान चलाना ही होगा।
(त्रिदेव दुग्गल मुंढालिया, युवा साहित्यकार, भिवानी)

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