फर्जी फर्म संचालकों का गोरख धंधा

सिरसा(प्रैसवार्ता)। फर्जी फर्मों के माध्यम से सरकार को करोड़ों रुपए की चपत लगाने वाले सफेदपोश लोगों को बेनकाब करने की मांग अब उठने लगी है। व्यापारी ही नहीं जनता भी अब ऐसे फर्म संचालकों के चेहरे से नकाब हटता हुआ देखना चाहती है जोकि समाजसेवा की आड़ में करोड़ों रुपए के टैक्स की चोरी कर रहे हैं। लोगों में आबकारी एवं कराधान विभाग की कार्यप्रणाली पर भी संशय होने लगा है। डीईटीसी से संदिग्ध फर्मों की जानकारी सार्वजनिक किए जाने की मांग उठने लगी है। विभागीय स्तर पर पारदर्शिता के लिए ऐसी संदिग्ध फर्मों के पार्टनर/प्रोपराइटर के नाम पते, उनके राशन कार्ड, ठिकाना, उनके गारंटर इत्यादि की जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए ताकि आम आदमी जान सके कि करोड़ों रुपए का कारोबार करने वाले वो कौन व्यवसायी हैं? 
सिरसा में पिछले कईवर्षों से फर्जीफर्म संचालकों ने कानून का मजाक बनाकर रखा हुआ है। चंद भ्रष्ट अधिकारियों से मिलकर सैकड़ों फर्जीफर्मों का गठन करना और इन फर्मों के माध्यम से करोड़ों का लेन-देन दर्शाना फर्जी फर्म संचालकों का काम रहा। कराधान विभाग से करोड़ों रुपए का रिफंडहासिल कर लेना इनकी विभागीय अधिकारियों से मिली भगत साबित करता है। फर्जी फर्म संचालकों की कार्यप्रणाली भी हैरानी वाली रही है। अचरज वाली बात यह है कि नरमा, कपास का धंधा करने वाली फर्में करोड़ों रुपए कर सिगरेट की खरीद करती हैं जबकि इन फर्मों का सिगरेट के खाली पैकेट से भी दूर-दूर का भी कोईवास्ता नहीं है।सिगरेट और नरमा के टैक्स में भारी अंतर की वजह से फर्जी फर्म संचालकों ने सिगरेट को टैक्स चोरी का माध्यम बनाया। कागजों में सिगरेट की खरीद दर्शाईऔर कराधान विभाग से टैक्स का रिफंड हासिल कर लिया। 
जिन फर्मों का कोईवजूद ही नहीं है ऐसी फर्मों द्वारा करोड़ों रुपए का लेन-देन दर्शाया जाता रहा। इन फर्मों के मालिक व्यवहारिक जीवन में कार ड्राइवर, माली और सेवादार का काम करते हैं उन्हें तो व्यापार से कोई लेना-देना ही नही ंहै। न ही उन्हें टैक्स चोरी का ही भान है। अचरज की बात यह है कि विभिन्न बैंकों में इन कर्मचारियों के बतौर फर्म मालिक खाते खुले हैं और फर्जी फर्म के मास्टर माइंडलोगों द्वारा बैंक अधिकारियों से मिलीभगत कर इन खातों को संचालित किया जाता है।
सूत्रों के अनुसार बैंकों के अधिकारियों को महंगे तोहफे देकर फर्जी फर्म संचालकों ने गलत तरीके से बैंक खाते खोले और फर्जीफर्मों का लेन-देन किया। दूसरे के नाम से संचालित इन फर्मों का लेखा-जोखा फर्जीफर्म संचालकों ने किया। लाखों-करोड़ों रुपए के लेन-देन में कभी भी फर्म के मालिक से बैंक अधिकारी रुबरु नहीं हुए। सही मायने में खाता धारक को बैंक वाले पहचानते भी नहीं हैं क्योंकि उनका वास्ता फर्जीफर्म के संचालकों से ही होता रहा है। ऐसे में फर्जीफर्मों के संचालन में प्राइवेट व सरकारी बैंकों के भ्रष्ट अधिकारियों का भी भरपूर सहयोग रहा है। यदि मामले की उच्च स्तरीय जांच होती हैतो आबकारी एवं कराधान विभाग के अधिकारियों के साथ-साथ बैंकों के अधिकारियों का बच पाना मुश्किल है।

गहरी जड़े है फर्जी फर्मों की
फर्जी फर्मों की जड़ें बड़ी गहरे तक जुड़ी हैं। न केवल सिरसा और हरियाणा बल्कि देश भर में सिरसा की इस मामले में तूती बोलती है। फर्जीफर्म संचालकों द्वारा देश के कोने-कोने में रुई की गांठें, धान और चावल तथा गेहूं पहुंचाया जाता है। जिला वार कराधान विभाग के अधिकारियों की तैनाती के बावजूद फर्जीफर्म संचालक तमाम बैरियर आसानी से पार कर लेते हैं। फर्जीफर्म संचालकों के दावे को यदि मानें तो वे बंग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान सहित दुनिया में कहीं भी दो नंबर का माल भेज सकते हैंं। इसकी एवज में कुछशुल्क अतिरिक्त अदा करना पड़ेगा। कराधान विभाग में अंदर तक घुसपैठ की वजह से फर्जीफर्म संचालक बरसों से टैक्स चोरी का काला धंधा धड़ल्ले से कर रहे हैं।

डीसी टैक्स रिफंड रोकें
फर्जीफर्मों के माध्यम से करोड़ों रुपए का रिफंड लेने के मामले में जिला उपायुक्त डॉ. अंशज सिंह को संज्ञान लेना चाहिए। उन्हें मामले की उच्च स्तरीय जांच पूरी होने तक टैक्स रिफंड पर रोक लगानी चाहिए। जांच में जिन फर्मों का कामकाज साफ सुथरा है उन्हें अविलंब टैक्स का रिफंड करना चाहिए और जिन फर्मों का गठन नियम विरुद्ध किया गया है ऐसी फर्मों की पूरी तहकीकात की जानी चाहिए। ऐसी फर्जी फर्में सरकार को टैक्स रिफंड के रुप में चपत न लगा सकें। इसके लिए टैक्स रिफंड पर रोक लगाा देनी चाहिए।

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