छत्रपति जीवनवृत : बेखोफ, निडर व साहसी जज्बे के पत्रकार थे छत्रपति

भारतीय पत्रकारिता का इतिहास गवाह है जब-जब सामाजिक एकता व राष्ट्रीय संप्रभुता पर संकट के बादल मंडराए हैं। पत्रकारों ने दूसरे देशवासियों की तरह आगे आकर कुर्बानियां दी हैं। भारतीय सवाधीनता आंदोलन का पूरा इतिहास पत्रकारों  के बलिदान की कहानी कहता है। पिछले एक दशक से 'पूरा सच' के सम्पादक व वरिष्ठ पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति भी सामाजिक विषमताओं के विरुद्ध संघर्ष चलाए हुये थे। इस दौरान बहुत से ऐसे अवसर आए जब राजसत्ता व धनसत्ता ने दबाव डालकर सच्चाई को सामने न आने देने का प्रयास किया किंतु छत्रपति इन दबावों व प्रलोभनों को एक ओर रखकर अपने कर्तव्य को पूरा करने से नहीं हिचकिचाए। सच की लड़ाई जब वर्तमान समय में एक बहुत गंभीर मामला है के लिए छत्रपति ने आत्मोत्सर्ग कर दिया।
श्री छत्रपति का जन्म 19 मार्च 1950 को पंजाब के फिरोजपुर जिला के गांव रानीवाला में अपने ननिहाल में हुआ। 1947 में देश के विभाजन के दौरान पाकिस्तान से प्रवास करके  सिरसा जिला के गांव दड़बी आए श्री सोहन लाल संधा व कर्मो देवी के यहां जन्म लेने वाले श्री छत्रपति ने एल.एल.बी. तक शिक्षा प्राप्त की। पत्रकारिता और लेखन जैसे उनके रक्त में थे।कालेज के जमाने में वे कालेज के पत्रिका आवेदन के संपादक रहे तथा दो वर्ष तक साप्ताहिक राजधर्म का भी संपादन किया।उनके कई गंभीर समाचार लेख करनाल से प्रकाशित राष्ट्रीय दैनिक 'स्वतंत्र विश्वमानव' में प्रकाशित होने के पश्चात् जिसके बाद वे एक पत्रकार के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। नई दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक जेवीजी टाईम्स के 1996 में जिला संवाददाता नियुक्त हुए। जब समरघोष का प्रकाशन सिरसा से प्रारम्भ हुआ तो श्री छत्रपति 'प्रतिदिन' नाम से एक कालम लिखने लगे। 'प्रतिदिन' अपनी स्टीक टिप्पणियों से प्रबुद्ध पाठकों में लोकप्रिय हो गया। 'प्रतिदिन' में श्री छत्रपति ने कई गंभीर मुद्दों पर समाज में व्यापक बहस छेड़ी और यहीं से उन्होंने अपना सांध्य दैनिक निकालने का संकल्प ले लिया। 
2 फरवरी 2000 को श्री छत्रपति के सम्पादन में 'पूरा सच' का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। 'पूरा सच' ने स्थानीय दैनिकों में एक अलग पहचान बनाई। पिछले तीन वर्षों से श्री छत्रपति 'पूरा सच' के साथ-साथ राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक हिंदुस्तान के जिला संवाददाता के पद पर भी कार्य कर रहे थे।
पत्रकारिता के साथ श्री छत्रपति एक अच्छे पाठक व साहित्यिक समालोचक भी थे। सिरसा में जब भी साहित्य गोष्ठियों का आयोजन किया जाता तो उनमें श्री छत्रपति की उपस्थिति अनिवार्य सी हो गई थी। साहित्य के प्रति उनकी लगन ने उन्हें एक गंभीर पाठक के रूप में भी स्थापित किया और यही पाठक बाद में साहित्यिक समीक्षक व समालोचक के रूप में प्रतिष्ठित हो गया। साहित्यिक संगोष्ठियों में उनकी स्टीक समीक्षाएं व टिप्पणियां लम्बे समय तक चर्चा में रहती थीं। पंजाबी साहित्य सभा सिरसा ने श्री छत्रपति के साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें सम्मानित भी किया। छत्रपति व्यंग्य, कविता भी करते थे। कई स्थानों पर आयोजित कवि सम्मेलनों में उनकी 'मुझको मंत्री बन जाने दो' कविता राजनीतिक व्यवस्था पर गहरी चोट करती प्रतीत होती।
'पूरा सच' का प्रकाशन प्रारम्भ होने के बाद श्री छत्रपति पूरी तरह पत्रकारिता पर समर्पित हो गए।पत्रकारिता जीवन में जब-जब किसी पत्रकार पर संकट आया छत्रपति ने आगे बढ़कर पीडि़त पत्रकार का सहयोग दिया। सिरसा जिला प्रेस क्लब के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर पत्रकारों का नेतृत्व करने वाले श्री छत्रपति राकेश चिटकारा स्मृति न्यास के संस्थापक अध्यक्ष भी थे। बहुमुखी  प्रतिभा के धनी श्री छत्रपति समाज व देश की विषमताओं को समाप्त करने के लिए जिस ढंग से संघर्ष कर रहे थे वह अपने आप में अनूठा था। उन्हें पिछले लम्बे समय से डेरा सच्चा सौदा की ओर से जान से मारने की धमकियां भी मिल रही थी किन्तु इन धमकियों ने उनके आत्मबल को और भी मजबूत कर दिया। छत्रपति मानते थे कि उन्हे कोई थप्पड़ नहीं मारेगा अपितु उनकी सच्ची रिपोर्टिंग व तीखी टिप्पणियों से बौखलाकर सच्चाई को दबाने वाले उन्हें गोली ही मारेंगे।वे सदा कहते भी थे कि छत्रपति मौत से नहीं डरता और यही बेखोफ, निडर व साहसी जज्बा ही उन्हें अमर कर गया।(अंशुल छत्रपति, प्रैसवार्ता)

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