भोपाल गैस कांड: 30 साल बीत गए, आज तक नहीं मिला न्याय

दिसम्बर का माह भोपाल की आबो-हवा कमायत के दिन तक नहीं भुला सकती या यू कहे कि वो तो कयामत को देख चुकी थी। 2दिसम्बर 1984 की आधी रात को युनियन कारबाईड नाम की दानवी कम्पनी से निकली जहरीली गैस ने हजारों लोगों का मौत के घाट उतारा व लाखों को विकलागता के नरक में धकेल दिय। पशु-पक्षी वनस्पती कोई भी इसे विष से अछुती नहीं रही। भोपाल गैस त्रास्दी देश ही नहीं विश्च की उन अनेक मानव जनित आपदाओं में से एक है, जिसमें मानवता और पर्यावरण को बुरी तरह से नुकसान पहुचाया। चन्द मुनाफे के लिए युनियन कारबाईड ने सुरक्षा यन्त्रों को दुरस्त नहीं रखा जिसकी वजह से यह हादसा हुआ। अब जब भोपाल गैस त्रास्दी की 30वी बरसी पर मानवता खून के आंसू रो रही है। वही कम्पनी विश्व के अन्य देशों में अभी भी स्वतन्त्रता से अपना व्यापार चला रही है। मुख्य आरोपी एंडरसन ऐश की जिन्दगी जी कर अपनी मौत मारा गया। भोपाल गैस पीडितों की कहानी जाने तो दिल रो पडता है लगता है कि आजाद देश की 1984 से लेकर अब तक की कोई भी सरकार गैस काण्ड के दोषियों को सजा नहीं दे पाई और ना ही गैस पीडितों के आंसु पोछ पाई। 
क्या है भोपाल गैस कांड
                  भोपाल में सन 1969 मे यू.सी.आइ.एल.कारखाने का निर्माण हुआ जहाँ मिथाइल आइसोसाइनाइट नामक पदार्थ से कीटनाशक बनाना आरम्भ हुआ। वर्ष 1979 मे मिथाइल आइसोसाइनाइट के उत्पादन के लिये नया कारखाना खोला गया। नवम्बर 1984 तक कारखाना में कई सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था। स्थानीय समाचार पत्रों की रिपोर्टो अनुसार सुरक्षा के लिए रखे गये सारे मैनुअल अंग्रेज़ी में थे जबकि कारखाने में कार्य करने वाले अधिकतर को अंग्रेजी का ज्ञान नहीं था। समस्या यह थी कि टैन्क संख्या 610 मे नियमित रूप से ज्यादा एमआईसी गैस भरी थी तथा गैस का तापमान भी निर्धारित 4.5 डिग्री की जगह 20 डिग्री था। दिनांक 2-3 दिसम्बर की रात को टैन्क इ-610 मे पानी का रिसाव हो जाने के कारण गर्मी व दबाव पैदा हो गया और टैन्क का अन्तरूनी तापमान 200 डिग्री के पार पहुच गया जिससे विषैली गैस का रिसाव वातावरण मे हो गया। 45-60 मिनट के अन्तराल लगभग 30 मेट्रिक टन गैस का रिसाव हो गया। कम्पनी के अधिकारी एडंसन ने बाद में इसे किसी साजिश का नाम भी देना चाहा पर भारतीय वैज्ञानिकों की जांच व मजदूर संस्थाओं की जांच में तथ्य कुछ और ही निकल कर आए। जिससे ये साबित हो गया कि कम्पनी की मुनाफा खोर निती के चलते यह सब हुआ। हादसे के समय सुरक्षा यंत्र व सुरक्षा चेतावनीयां नकारा थी जिनका मौके पर इस्तेमाल नहीं हो पाया। मजदूरों द्वारा कम्पनी को दी गई गैस रिसाव की सुचना को भी नजरअन्दाज किया गया। वही गैस फैलने के बाद तक कम्पनी इसे छुपाती रही की गैस जहरीली है पर जब मरीजों से अस्पताल भरने लगे, बाहर लाशों के ढेर लग गए तभी उन्होंनें इस बारे में बताया गया कि यह मिथाइलआइसोसाइनाइट (मिक) नामक जहरीली गैस थी 
भोपाल गैस कांड के पीडि़त
                    अनुमान बताते हैं कि 8000 लोगों की मौत तो दो सप्ताहों के अंदर हो गई थी और लगभग अन्य 8000 लोग तो रिसी हुई गैस से फैली संबंधित बीमारियों से मारे गये थे। वर्ष 2006 में सरकार द्वारा दाखिल एक शपथ पत्र में माना गया था कि रिसाव से करीब 558,125सीधे तौर पर प्रभावित हुए और आंशिक तौर पर प्रभावित होने की संख्या लगभग 38,478 थी। 3900 तो बुरी तरह प्रभावित हुए एवं पूरी तरह अपंगता के शिकार हो गये। वर्ष 2004 तक साढ़े तीन लाख से ज्यादा गैस रिसाव के कारण बीमारी की चपेट में आए। जिसका प्रभाव अभी भी है इसी कारण वर्ष 1993 में इसे भोपाल त्रास्दी पर बनाए गऐ भोपाल-अंतराष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को पर्यावरण व मानव समुदाय पर होने वाले दीर्घकालिन प्रभाव को जानने का काम सौंपा गया। 
भोपाल कांड का न्याय
                   सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी और 15 हजार से ज्यादा जानें छीनने वाली व पांच लाख से ज्यादा लोगों को प्रभावित करने वाली इस नरसंहारक घटना की मुआवजा राशि मात्र 713 करोड़ रुपये दी गई। अर्थ था हर पीडित तक मात्र 30 से 35 हजार रूपए। दुर्घटना के 4 दिन बाद 7 दिसम्बर 1984 को यु सी सी अध्यक्ष और सी ई ओ वारेन एन्डर्सन की गिरफ्तारी हुई परन्तु 6 घन्टे बाद ही उन्हें मामूली जुर्माने पर छोड दिया गया। त्रास्दी के 2 दिन बाद राज्य सरकार ने राहत कार्य आरम्भ किया । जुलाई 1985 मे मध्य प्रदेश के वित्त विभाग ने राहत कार्य के लिये लगभग एक करोड़ चालीस लाख डॉलर दी। अक्टूबर 2003 के अन्त तक भोपाल गैस त्रासदी राहत एव पुनर्वास विभाग के अनुसार 554,895 घायल लोगो को व 15,310 मृत लोगों के वारिसों को मुआवज़ा दिया गया है। बैगर किसी जातीय भेदभाव के हिन्दू-मुस्लिम सहयोग से कार्य आरम्भ हुआ। श्री सतिनाथ सारङी का जिन्होने पीडितों कि राहत के लिये सम्भावना ट्रस्ट नामक संस्था भी तैयार की। अभी भी समय-समय पर भोपाल गैस पीडित अपने हकों के लिए आवाज बुलन्द करते रहे है वही एक नई फिल्म भी 30वी बरसी पर आ रही है जिससे दुबारा विश्व का ध्यान इस और गया है। अभी भी राजधानी में जंतर-मंतर पर आप भोपाल गैस पीडितों को न्याय के लिए गुहार लगाता देख सकते है। 
आज मानव विज्ञान से दुनिया जीत रहा है पर वहीं मुनाफाखोरी की नितियों ने मानवता को कोसों दूर छोड दिया है जिसका नतीजा है विज्ञान का इस्तेमान कुछ धनाडय पैसों की खेती करने में लगे हुए है उन्हें ना तो भोपाल पीडितों से मतलब है ना ही किसी मानवता के अर्थ से। वो कानून के जाल को कुतरने का इन्तजाम भी कर लेते है। भोपाल गैस त्रास्दी बहुत कुछ सीखने की ओर इशारा करती है। बहुत अच्छा होगा अगर हम समय रहते इसे समझे जिससे मानव व पर्यावरण दोनों बचे रहे। यही भोपाल गैस में मारे गए लोगों के साथ विश्व में अन्य रासानियक रिसावों से मरने वालों के लिए सच्ची श्रंदाजलि होगी। भोपाल न्याय के लिए सवाल लगातार उठा रहा है जिसका जवाब 30साल बाद भी उसे नहीं मिला।(नवल सिंह, प्रैसवार्ता)

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