5 दिसम्बर 1991 काली,मनहूस शाम - आंतक ने बुझा दिए थे 27 घरों के चिराग

जख्म कैसा भी हो,वो एक ऐसा दर्द दे जाता है दर्द देता है, परिजनों को आँसूू बहाने के लिए एक शून्य जीवन। जिसको भरने के लिए दिन ही नहीं साल भी कम पड़ जाते हैं। जब ये घटनाएँ घटी होती हैं। इस विषय पर सोचते हुए एक बिन्दु जो विशेष तौर पर चोट करता है वो है कि क्यों कुछ इन्सान अपने तुच्छ स्वार्थों के हवन कुंड में संैकड़ों की बली देते हैं?  एक ऐसा दर्द जिसे टोहाना वासियों ने भोगा, उनसे लड़े और आज फि र पूरी शक्ति से जीवन संरचने में जुट गए। ये दर्द है परिजन खो चुके परिवारों का, ये दर्द है आतंक के पंजे का जिससे टोहाना ही नही पूरा राज्य कांप उठा था। 
पंजाब आतंक के बुरे दौर से गुजर रहा था इसी समय में पंजाब प्रान्त से जुड़ा छोटा सा कस्बा टोहाना भी आंतक की लपटों से खुद को बचा नही पाया। 5 दिसम्बर 1991 की काली,मनहूस शाम एक वाहन में आए आतकियों ने शहर के बीचों बीच अंधाधुन्ध फायरिंग की जिसने पुरे शहर को आतंक की चादर को ढक दिया चीखों-पुकार के साथ जगह-जगह गिरी लाशों ने हर किसी को एक बार तो सदमें में डाल दिया था । आज भी जब वो दृश्य टोहाना के नागरिकों के सामने आता है तो उनके रोगटे खड़े हो जाते हैं। 
5 दिसम्बर 1991 की वो काली शाम भुलाए नही भूलती जब एक आतंकी आंधी ने एक साथ 27 घरों के चिरागों को बुझा दिया साथ में दिए कभी भी न भुलाए जाने वाले जख्म। आंतकवाद की आग में सुलगते पंजाब की आँच कुछ ही पलों में तबाही मचा कर टोहाना की सड़कों को खून से भीगों दिया उग्रवादियों ने ए.के.47आधुनिक राईफलों से इस खूनी खेल को खेला । रोजमर्रा की तरह टोहाना शहर अपने कार्यों में लगा था दुकानदार दुकानों पर अपने ग्राहकों में व्यस्त थे शहरवासी अपने अपने कार्यो में लगे थे कर्मचारी अपने कार्यलयों से कार्य को निपटा कर जल्दी से घर चलने की तैयारी में लगे हुए थे पर शायद कोई भी नही जानता था कि आने वाले पल उनकी जिन्दगी को हिला कर रख देगे । तभी 5 बजे के करीब नेहरू मर्किट में एक वाहन में सवार होकर आए आतंकियों ने भरे बाजार में अंधाधुघ गोलीबारी करनी शुरू कर दी गोलियों की आवाज ने शांत शहर में भय का वातावरण पैदा कर दिया। 
गोलियों की आवाज को सुन  दुकानों के शटर धड़ाघड़ गिरने शुरू हो गए जो जहाँ बैठा था वहीं बन्द हो कर रह गया जो दुकानों से,मकानों से बाहर थे उन्होनें भाग कर अपने जीवन को बचाने की कवायद शुरू कर दी जिसे जहाँ पर जगह मिली वहीं पर वो भाग निकला। गोलियाँ 27 लोगों के जीवन को लील गईं 15 जिन्दगियाँ घायल हुई । घरौंडा के 4 व्यापारी भी इसी गोलीकाण्ड का शिकार हो गए शायद मौत ही उन्हें टोहाना खींच लाई थी। दु:खों का पहाड़ टूटा अर्जुन दास परिवार पर उनके साथ उनके युवा पुत्र विजय व अजय भी गोलियों की चपेट में आ गए। इस विषय को पहली बार लेखक द्वारा एक पुस्तक आततायी-एक श्रंदाजलि में विस्तार के घटना के साथ पीडित परिवार की व्यथा को लिखा गया, जिसका विमोचन गतवर्ष किया गया। इसी पुस्तक के एक अंश यहां भी श्रंदाजली के रूप में 
वो दिन बड़े ही दु:खदायी थे - 
वो दिन बडे ही दुख:दायी थे ऐसा लगा जैसे किसी भूकम्प ने हमारी गृहस्थी को ही तहस-नहस कर दिया हो। जज मडिय़ा व मानव सेवा संगम ने उस वक्त पूरी मदद की। सब जानते  है पिता का साया अकाल मृत्यु में सिर से उठने कितना तकलीफ देता है। उसके बाद मेरी जिन्दगी जीने की जंग शुरू हुई,हादसे के डेढ़ महिने बाद मेरे साथ अन्य सात पीडि़त परिवारों के सदस्यों को अस्थाई नौकरी मिली, 89 दिन की अस्थाई नौकरी में 80 दिन होते ही नौकरी से हटने व परिवार का पेट पालने की चिन्ता से दिमाग में भूचाल उठना शुरू हो जाता था, उस वक्त जिला मुख्यालय हिसार था।  योगराज के पिता भी हम लोगों के साथ थे उन्होनें भी  कई कष्ट भोगे,अकेली सन्तान के चले जाने के बाद कैसी जिन्दगी होती है मैं हम हर रोज उनकी आँखों में पढता था, आज भी उनकी आँखों में वही दर्द जिन्दा है। डेलीवेजीज पर हमें 20 जनवरी 1992 में नौकरी मिली। रैगुलर होने का वो वाक्या मुझे आज भी याद है जब एक उच्च अधिकारी को हमने अपनी दास्ताँ सुनाई तो उन्होनें एक कलम हमें 25 जुलाई 1995 से पक्का कर दिया हम उस अधिकारी का अहसान कभी नहीं चुका सकते। आज उस हादसें को बरसों गुजर चुके है। पीडि़त परिवारों में से कुछ शहर भी छोड़ चुके है। कुछ इस हादसे को याद भी नहीं करना चाहते,समय के साथ इस जिम्मेवारी को कुछ संस्थाओं व जागरूक नागरिकों ने माना है कि हमें इस गोलीकाण्ड के शहीदों को श्रृद्धांजली देनी चाहिए, पर टीस इस बात कि है कि  गोलीकाण्ड के शहीदों की याद में नेहरू मार्किट का नाम बदल कर शहीद मार्किट रखा गया था, पर प्रशासन की बेरूखी व लापरवाही के चलते इसे आज तक मंजूरी नहीं मिली। जिसको लेकर उनके मन में रोष है। वहीं स्मारक की बात एक दिन चर्चा में रहने के बाद हवा हो जाती है। (नवल सिंह, प्रैसवार्ता) 
-(आतंकी हमले में शहीद मैलूराम के पुत्र संजय मुखी ने जैसा लेखक नवल सिंह को बताया)

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