क्या दामिनी की तरह परी देश की बेटी नहीं थी : परी मरते मरते बोली, पापा मुझे इंसाफ दिलाना, इन लोगों को मत बख्शना

लुधियाना(गौतम जालंधरी)। यह बात समझ से परे है कि दिल्ली में अगर किसी लड़की से कोई घटना हो जाए तो पूरा देश हिल जाता है। लेकिन ऐसी ही और इससे भी विभत्स घटनाएं देश के दूसरे राज्यों में हो रही है तो सरकार व प्रशासन वैसी सक्रियता क्यों नहीं दिखाता है। यहां यह कहना बिल्कुल नहीं है कि दिल्ली के दामिनी केस व अन्य प्रकरणों पर सक्रियता नहीं होनी चाहिए थी लेकिन आखिर दिल्ली के बाहर दूसरे राज्यों की बेटियां भी इस देश की उतनी ही इंसाफ की हकदार है, जितनी की राजधानी है। फिर क्यों सरकारें व अफसरशाही दिल्ली प्रकरणों पर ही इतनी सक्रियता दिखाता है। लुधियाना की परी भी देश की बेटी थी। वह सवा महीने से उसे इंसाफ दिलाने के लिए उसके माता-पिता अपनी बेटी के साथ कानून का हर दरवाजा खटखटाते रहे लेकिन न तो प्रशासन व न ही पुलिस ने उनकी सुध ली। आखिरकार गुंडों के आगे जिंदगी भी हार गई और नाबालिग परी ने दम तोड़ दिया।
परी के पिता के अनुसार उसे  तो जैसे बेटी होने का दंड मिला है। यदि ऐसे ही चलता रहा तो कौन बेटियां चाहेगा। उसकी बारहवीं कक्षा में पढऩे वाली बेटी को 25 अक्टूबर को चार बदमाशों अनवर, शहजाद, नियाज, विक्की ने अपहरण कर लिया। फिर 27 अक्टूबर को उसे घर के बाहर फैंक गए। तब से वह पुलिस के पास शिकायत करने जा रहे हैं लेकिन पुलिस ने दो दिन पर्चा तो दर्ज कर दिया लेकिन हल्की धाराओं में। पब्लिक ने पुलिस को रोष जताया तो भी दुष्कर्म की बजाये केवल छेडछाड की धारा जोड़ दी। जिससे आरोपियों को गिरफ्तारी के कुछ दिन बाद ही जमानत मिल गई। इसके बाद बदमाशों द्वारा धमकाने व उनके घर में घुस कर शरेआम मारपीट करने क सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि पुलिस को बार-बार शिकायतें करने पर भी नहीं थमा। 4 दिसंबर को आरोपियों ने उनका जीवन बर्बाद का दिया। हमारी परी को घर में घुस कर जिंदा जला डाला। हैवानों तो तरस न आया लेकिन पुलिस ने भी अपनी कम हैवानियत नहीं दिखाई। न तो एंबुलेंस आई और न ही मोटर साइकिल पर जली अवस्था में परी को थाना पुलिस फोक्ल प्वाइंट ले जाने पर पुलिस वालों ने कोई गाडी दिलाई। बोला, जैसे लाये थे, वैसे ही अस्पताल ले जाओ। सिविल अस्पताल में भी इलाज न मिला तो पीजीआई ले गए। जहां भी हमारी बच्ची बच नहीं पाई। जब भी वह होश में आती बस यही कहती, पापा.. मम्मा मुझे इंसाफ जरूर दिलाना, इन लोगों को मत बख्शना।
हैरानी की बात यह है कि न तो पुलिस व न ही प्रशासन ने उनकी सुध ली। अब जब परी इस दुनिया में नहीं रही तो माहौल बिगडऩे के डर से पुलिस ने छह थानों की पुलिस इलाके में तैनात कर दी ताकि लोग भड़के नहीं तथा मामले में कोताही बरतने के आरोपी मेें ईशर कालोनी के चौकी इंजार्ज मोहन लाल व चौकी इंचार्ज कंगनवाल दलवीर ङ्क्षसह सहित एक हेड कांस्टेबल बलजीत ङ्क्षसह मुंशी को सस्पेंड कर दिया है तथा मामले की जांच के लिए एक टीम गठित कर दी है। केस के दो आरोपी बब्बू व अमरजीत अभी फरार है। सवाल उठता है कि इतनी ही सक्रियता यदि पुलिस घटना के पहले ही दिन दिखा देती तो आज परी जिंदा होती और गुंडे भी सलाखों के पीछे होते। प्रैसवार्ता परिवार दिवंगत बच्ची की आत्मिक शांति के लिए अरदास करता है तथा देश के पुलिस प्रशासन व मीडिया से इस बात की उम्मीद करता है कि वह ऐसे केसों को दामिनी केस की तरह हैंडल करे ताकि दोषियों को शुरू से ही काबू किया जा सके तथा कोई और बच्ची परी की तरह अपनी जिंदगी की जंग न हारे।

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