पत्रकार धीरज बजाज: बुझ चुकी है शमां मगर रोशनी महफ़िल में है..

सिरसा के पत्रकार धीरज बजाज नही रहे, धीरज बजाज का आकस्मिक निधन' सोशल साइट्स और अखबारों में ये दुखद खबरें देखकर हम सबके दिलों को जो ठेस पहुंची है, उसको लिख बोल कर ब्यान कर पाना सम्भव नहीं है। गुणी कलमकार धीरज बजाज के रुखसत होने के बाद उनके तमाम चाहने वाले खुद को हद से ज्यादा गमगीन, अकेला एवं ठगा सा महसूस कर रहें हैं। उनके जाने के बाद समूचा पत्रकारिता जगत आहत है। छोटी सी उम्र में पत्रकारिता के नये आयाम छूने वाला धीरज हमारे बीच एक ऐसा रिक्त स्थान पैदा कर गया जिसकी भरपाई निकट भविष्य सम्भव नही है।  कलम के सिपाही धीरज ने खुद को खत्म करने से पहले बेशक इंटरनेट की सोशल साइट्स से स्वयं से जुड़ी तमाम लेखन सामग्री और फोटोज तो सब रिमूव कर दिए हों लेकिन धीरज अपने हंसमुख स्वभाव अपने उल्लेखनीय कामों के कारण हम सबके दिलों में हमेशा हमेशा जिन्दा रहेंगे।
उनके जाने के बाद उनको समर्पित ये श्रद्धान्जलि लेख लिखते हुए कितना दुखी हूँ, कितना टुटा हूँ ? मेरी आत्मा ही जानती है कि मैं किस स्थिति में कंप्यूटर के सामने बैठा टिक-टिक कर अपने उस हसीं दोस्त के लिए लिख पा रहा हूं। यूँ तो दरअसल मेरा काम लिखना ही है और पिछले 10 सालों में मैंने न जाने कितनी दोस्ती, हादसे, मौत, सुसाइड और न जाने किस प्रकार की खबरें और स्टोरियां बनाई होंगी। एक कलमकार होने के नाते काफी कुछ लिखा है। मगर मेरे साथ ये पहली बार हुआ है कि आज मैं कुछ लिख रहा हूँ तो अन्दर से पूरा टूटकर ही लिख पा रहा हूँ। बार बार आ रहे अश्कों के चलते की-बोर्ड के साथ ही रखे रुमाल को उठाकर आँखे मल रहा हूँ। बेशक आजकल फेसबुक और फोन के अलावा मेरा सीधा संपर्क धीरज से नहीं था, मगर उनके चले जाने के बाद यूं लग रहा है जैसे मेरा कोई ख़ास अपना चला गया हो। उनके साथ दिन बिताने वाले तमाम दोस्त मानते हैं कि उसके साथ रहने से ऐसा लगता था कि हमारे सामने हर बड़ी से बड़ी जंग भी साधारण सी बात है। 
दरअसल पिछले करीब 7-8 सालों से मेरा उस युवा सोच के साथ जुड़ाव था, जो हर वक्त समाज, घर परिवार, रिश्ते नाते और अपने कर्तव्य की डोर से बंधा रहता था। हमेशा सच की राह में बेख़ौफ़ बढऩे की बात करना और जैसे उसके ख्याल ऊंचे थे कमोबेश ऐसा ही व्यवहार भी उसका बखूबी बना रहता था। समझ नहीं आ रहा कि दूसरों की परवाह करने वाला शख्स धीरज बजाज इतना सुपर मेच्योर होने के बावजूद अधीर कैसे हो गया? आखिर कौन सी ऐसी टीस थी जिसने उस कलम के जांबाज को अपने हाथों अपनी ही जीवन लीला समाप्त करने को मजबूर कर दिया ?  
बेशक उम्र के लिहाज से वह एक रोमैंटिक से स्वभाव के नवयुवक मालूम पड़ते थे, मगर लेखन में उसके काम करने का ढंग हर कलमकार के लिए एक खुबसुरत प्रेरणा है। उसने हम सब कलमकारों को बहुत कुछ सिखाया जो अमूल्य है। एक साधारण पत्रकार से जिला प्रमुख खबरनवीस व सांध्य अखबार थर्ड वे के सम्पादक तक का उनका सफर कलमकारों के लिए एक प्रेरणामयी मिसाल है। तमाम कलमकार साथी तीन दिसंबर के उस मनहूस दिन को अपने जीवन में कभी नहीं भुला पाएंगे जिस दिन ने हर दिल अजीज कलमकार धीरज को हमसे हमेशा हमेशा के लिए छीन लिया। लेखन की कठिन राहों पर चलकर समाज भलाई कार्यों के लिए सबको प्रेरित करने वाला धीरज बजाज वही युवक था, जिसने अपनी ताकतवर कलम से सिरसा के प्रशासनिक तंत्र को श्रम करो या शर्म करो जैसी पंक्तिया लिखकर जनहित के काम करने को मजबूर कर दिया था। जिन्दगी से थका हूँ हारा नही हूँ ' ये वाक्य अकसर दोहराने वाले धीरज का धेर्य किन विकट हालातों में जवाब दे गया, ये प्रश्न समूचे सिरसावासियो व उसके सभी मित्र प्यारों को अंदर ही अंदर कचोटता रहेगा। सभी दोस्त उसे अलग-अलग नाम से पुकारते थे और धीरज ने सभी नामों को स्वीकार किया और पलट कर कभी किसी का उपहास नहीं उड़ाया। भले ही वह खुद हंसी मजाक का पात्र बना रहा हो। आखिर समाज के लिए समग्र विकास, नई दिशाएं, युवाओं के लिए रोजगारपरक राहों का ख्वाब देखने वाले धीरज ने स्वयं के लिए ऐसी दिशा चुनी जिस दिशा में मिलती है निराशा, पीड़ा, दर्द, आहें। प्रिय धीरज। खुदा जाने अचानक तुम इस दुनिया से खफा क्यों हो गये। धीरज काश। कि तुम आकर अपने निधन खबरों को झूठा साबित कर पाते। काश तुम ऑनलाइन होकर अपने तमाम चाहने वालों को कह पाते कि यार "तुम सब कैसे हो"
काश तुम मेरी लिखी गजलों पर अपने खुबसुरत कमेन्ट कर पाते। काश तुम अपने थर्ड वे नामक सोशल पेज को अपने विचारों एवं अपने अखबार के पन्नो से अपडेट कर पाते। 
.... लेकिन...सच है ऐसा नही होगा अब तुम कभी नही आओगे मगर तुम्हारा हौंसला, जज्बा और बेख़ौफ़ कलम चलाने का अंदाज हम सबके दिलों में आपके होने का अहसास कराता रहेगा।
धीरज बजाज के लिए लिखने को अंदर ही अंदर अल्फाज तो बहुत ज्यादा उमड़ रहे हैं, बहुत कुछ उनके लिए लिखने की तमन्ना है लेकिन यकीन मानिए आगे लिखने की हिम्मत नहीं हो पा रही है।
मैं मानता हूं कि होता वही जो मंजूरे खुदा होता है" जो धरती पे दिखता है वो नश्वर है, अस्थायी है। लाजमी है एक दिन वो सब फनाह होगा ही होगा, मगर कुछ शख्सियतें ऐसी भी है जो जाने के बाद समाज को अपनी कमी महसूस करा जाती हैं। अपनी कलम से नई इबारत लिखने वाला धीरज अब कभी मुड़कर नहीं आएगा और उसकी कमी हम सभी को दुखी करती रहेगी। अंतिम संस्कार के दौरान उसे श्रद्धांजलि देने पहुंचे लोगों की बड़ी भीड़ से भी यह बात पुख्ता होती है कि उसने हजारों लोगों के दिल में अपनी अलग जगह बनाई है और यही बात उसने अपने अंतिम पत्र में लिखी है कि मैंने ऐसा कोई दोस्त नहीं बनाया जो मुझ से नफरत करे। 
यारों के यार, मेरे दोस्त धीरज मै यही कहूंगा कि तुम हमे बड़ा याद आओगे, तुम्हे भूल पाना नामुमकिन है। 
कहते हैं जो जख्म देता है वो मरहम भी जरुर देगा। मेरे पुरे परिवार की ओर से कलम के जादूगर धीरज बजाज को हार्दिक नमन और खुदा से दुआ करेंगे कि गमगीन परिवार को उनके बिछोड़े का गम सहन करने की ताकत बख्शे। आखिर यही कहूँगा कि -
तू नही तो क्या तेरी उल्फत अभी तक दिल में है।
बुझ चुकी है शमां मगर रोशनी महफिल में है।
त्रिदेव दुग्गल मुंढालिया, प्रैसवार्ता
युवा कवि एवं गजलकार, भिवानी

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