तुम बहुत याद आओगे धीरज

मैं ये लेख लिख रहा हूं तो मेरी आत्मा ही जानती है कि मैं किस स्थिति में कंप्यूटर के सामने बैठा टिक-टिक कर अपने दोस्त के लिए लिख पा रहा हूं। दरअसल मेरा पेशा तो खबर बनाना ही है और इन 18 सालों में न जाने मैंने दोस्ती, हादसे, मौत, सुसाइड और न जाने किस प्रकार की खबरें स्टोरियां बनाई होंगी, मगर अब मेरे साथ ये दूसरी बड़ी बात है कि मैं खबर नहीं लिख पा रहा हूं। पहला वाक्य तब हुआ था जब एक सड़क हादसे में सीनियर एडवोकेट जयमल सिंह की मौत हो गई थी और उस समय मैं दैनिक भास्कर में कार्यरत था, मगर उनकी खबर नहीं लिख पाया था। बेशक मेरा सीधा संपर्क उनसे नहीं था, मगर उनके चले जाने के बाद भी यूं ही लग रहा था कि मानों मेरा कोई अपना चला गया हो। इसका अर्थ ये कतई न निकाला जाए कि दूसरों की खबर बनाता हूं तो क्या वो अपने  नहीं, मगर सामाजिक लिहाज से जो ताना-बाना बना हुआ है उसी के संदर्भ में मैं ये कह रहा हूं या सबसे दुखद घडी अब आई है जब मेरी खुद की बाजू टूट गई है। उसके साथ रहने से यूं लगता था कि हमारे सामने हर बड़ी जंग भी साधारण सी बात है। पिछले करीब दस सालों से मेरा उस युवा सोच के साथ जुड़ाव था, जो हर वक्त समाज, घर परिवार, रिश्ते नाते और अपने कर्तव्य की डोर से बंधा रहता था। हमेशा आगे बढऩे की बात करना और जैसे ही उसके ख्याल ऊंचे थे कमोबेश ऐसा ही व्यवहार भी उसका बना रहता था। मुझे समझ नहीं आता कि दूसरों की परवाह करने वाला शख्स धीरज इतना धर्यवान होने के बावजूद अधीर कैसे हो गया? आयु में वह मुझ से करीब 10 साल छोटा था,मगर उसके काम करने का ढंग शायद उसने मुझे भी बहुत कुछ सिखाया है। लेकिन मैं तीन दिसंबर के उस मनहूस दिन को अपने इस जीवन में तो नहीं भुला पाऊंगा जिस घड़ी ने मुझे अपंग सा बना दिया। सही मायने में कहूं तो घर से निकलने के बाद ही मैं इंतजार के पल में बैठा रहता था कि अभी धीरज आने वाला है। सभी दोस्त उसे अलग-अलग नाम से पुकारते थे और धीरज ने सभी नामों को स्वीकार किया और पलट कर कभी किसी का उपहास नहीं उड़ाया। भले ही वह खुद मजाक का पात्र बना रहा हो। मगर मेरे तालुक्कात उससे वैसे नहीं थे। मुझे बड़े भाई के रूप में देखता था और मैं भी उसे अपने बेटे के लिहाज से देखता था। लेकिन सच कह रहा हूं कि आगे लिखने की हिम्मत नहीं हो पा रही है। मैं मानता हूं कि इस नश्वर युग में जो आया है, उसका जाना भी तय है, मगर कुछ शख्सियतें ऐसी भी है जिसके जाने के बाद आदमी या उसका परिचित खुद को समाज की भीड़ में अकेला खड़ा पाता है और आज शायद उनमें मैं भी हूं। अपनी कलम से दूसरों के लिए प्ररेणा पैदा करने वाला धीरज अब नहीं आएगा और उसकी खाली जगह हम सभी को सालती भी रहेगी चूंकि अंतिम संस्कार के दौरान उसे श्रद्धांजलि देने पहुंचे लोगों की भीड़ से यह बात पुख्ता होती है कि उसने हर किसी के दिल में अपनी जगह बनाई है और यही बात उसने अपने उस अंतिम पत्र में लिखी है कि मैंने ऐसा कोई दोस्त नहीं बनाया जो मुझ से नफरत करे। लेकिन मैं, मेरे दोस्त, मेरे भाई धीरज यही कहूंगा कि तुम बड़ा याद आओगे और आज तुने फिर इंतजार की राह पर लाकर खड़ा कर दिया है। मेरी ओर से धीरज को नमन और भगवान से दुआ करेंगे कि आपके परिवार को इस दुखद घड़ी में शक्ति दें।(अरूण भारद्वाज)

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