साक्षात्कार : लोक संस्कृति के मर्मज्ञ साहित्यकार ओमप्रकाश कादयान

हरियाणवी बोली को पहला लघुकथा संग्रह देने का श्रैय साहित्यकार ओमप्रकाश कादयान के खाते में है। हरियाणा की मिटटी की सोधी खुशबू को अपने कैमरे, कलम व ब्रश के माध्यम से जन तक ले जाने का साहित्यकार ओमप्रकाश कादयान का अपना अंदाज है। झज्जर जिले के बेरी में जन्में प्रसिद्ध छायाकार, लोक संस्कृति के मर्मज्ञ ओमप्रकाश लगभग तीन दशकों से हरियाणवी लोक कला संस्कृति के संजृन में लगे हुए है। देश की शायद ही कोई स्तरीय पत्रिका या समाचार पत्र होगा, जिनमें इनकी रचनाएं ना छपी हों। उनकी 5हजार से अधिक रचनाएं, 15हजार से अधिक छायाचित्र, 3हजार से अधिक रेखाकंन, 250से अधिक पुस्तक समीक्षाएं पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी है। दर्जनों साहित्यिक पुस्तकों के कॅवर पर उनके चित्र छप चुके है। उनकी लिखी रचनाएं हिन्दी एम.ए. की कक्षाओं में पढ़ाई जा रही है। दूरदर्शन,अकाशवाणी केन्द्रों से इनकी वार्ताएं प्रसारित होती रही हैं। उनके चित्रों की प्रदर्शन विभिन्न विश्वविद्यालयों में लगाई जाती रहती है।  हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा विशेष अकादमी सम्मान से सम्मानित किया गया। प्रकाशित पुस्तकें की बात करे तो हरियाणा के लोकगीत भाग-2, हरियाणा की सांस्कृतिक धरोहर, हरियाणा की सांस्कृतिक विरासत, आन्ध्यां की लाठी(हरियाणवी का पहला लघुकथा संग्रह), कैक्टस के फूल (लघुकथा संग्रह), हम पंछी नील गगन के (बालगीत संग्रह) आदि है। भविष्य में कई अन्य योजनाओं पर उनका काम चल रहा है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी ओमप्रकाश कादयान सरल व मिलनसार स्वभाव के है। वैसे तो ओमप्रकाश कादयान कई विधाओं पर लिखते हैं, किन्तु लोक पर केन्द्रित साहित्य सृजन इनका मूल विषय है। इसी विषय पर उनके वार्ता करने का अवसर प्राप्त हुआ उसी मुलाकात के कुछ अंश - 
नवल सिंह - आपकी विधाओं में हरियाणा के गांवों की मिट्टी से उपजी दिल को छू लेनी वाली सवेदनाओं का क्या राज है?
ओमप्रकाश- हरियाणा के गांव में जन्मा, देहात की मिट्टी में खेल-कूद कर पला बड़ा हुआ, इसी मिटट्ी की गोद में बैठ कर अपनी रचनाऐं रची तो देहात की संस्कृति से, वहां की जमीन से जुड़ाव कैसे ना होता। उस महक का, उस भावना का विधाओं में उमडऩी लाजमी है। 
नवल सिंह- छायांकन (फोटोग्राफी) में गांव या शहर में कहां बेहतर महसूस करते है?
ओमप्रकाश- छायांकन का कोई वक्त नहीं, कोई स्थान नहीं पता नहीं। दृश्य को पहचाना होता है,चित्र खोजना होता है। पर चुकि गांवों हमारी जड़ें है वहां कला-संस्कृति का वास है। खेत-खलियानों व पगडण्डियों में प्रकृति का वास है जिसमें छायांकन की आत्मा बसती है। 
नवल सिंह- आपकी कथाओं में, रेखाकंन में, छायाचित्रों में व लेखन में प्रकृति का खासा असर देखा जाता है। प्रकृति से लगाव का कोई खास कारण?
ओमप्रकाश-बचपन से है, बच्चे थे तो गांव की बणी में (लघु जंगल), तालाबों पर, नहर पर, खेतों में, खूब घूमते थे। मैंने संस्कृति को जीया है प्रकृति से सीधे तौर पर साक्षात्कार किया है जिससे लगाव होना स्वाभाविक है। हर साहित्यकार का संजृन के लिए प्रकृति से संवाद होना जरूरी भी है।
नवल सिंह- चर्चा में है कि आप लोकगीतों को लेकर किसी बड़ी योजना पर काम कर रहे है इसमें बारे में कुछ बताऐंगे?
ओमप्रकाश- नवल जी, लोकगीत लुप्त होते जा रहे है इन्हें संग्रहीत करने के उददेश्य से मैने हरियाणा के गांवों की निरन्तर यात्राएं की, गांव की गलियों में, कच्चे-पक्के घरों में जाकर लेखन, छायांकन किया। जिसमें अधिकतर यात्राएं मोटरसाइकिल पर रही। लोकगीतों का बड़ा संग्रह किया। हरियाणा ग्रन्थ अकादमी ने इनमें से लोकगीतों से सम्बन्धित सामाग्री को हरियाणा के लोकगीत भाग-2 पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है। जिसे बेहद सराहा गया। इसी तरह से बिश्नोई समाज से सम्बन्धित लगभग 800 गीतों को भी मैंने जुटाया है। लोकगीतों को लेकर योजना यह है कि कम से कम दस हजार लोकगीतों को लेकर एक पुस्तक का प्रकाशन किया जाए।
नवल सिंह- आधुनिकता की आंधी में लोकगीत अन्तिम सासें ले रहे है इसे आप किस रूप में देखते है?
ओमप्रकाश कादयान- सबसे पहले तो हमें इस बात को समझना होगा कि हमारे लोकगीत उत्पादन से जुड़ी पैदायश है। जिसमें सामुहिकता का महत्व है। शादी-विवाह,जन्म-मृत्यु, खेत जोतते हुए, दूध बिलौते हुए,पनघट पर, फसल कटाई के वक्त इत्यादी समय पर गीत रचे व गाऐं जाते रहे है। गांव में कच्चे मकानों को लीप कर चित्रकारी की जाती थी। चुनर, ओढनी, पंखी के कलात्मक रूप के साथ चरख पर सूत कात कर घर-घर में कला संस्कृति को पीढी दर पीढी चलाया जा रहा था। समय बदला,परम्परा बदली पर अभी भी गांवों में गीत है जिन्हें सहेज कर आगे ले जानी की जिम्मेवारी हमें निभानी होगी। 
नवल ङ्क्षसह- कादयान जी आप क्या समझते है कैसे लोक साहित्य को बचाया जा सकता है?
ओमप्रकाश कादयान- जैसा मैंने पहले बताया सहेजना, यही इसका उपाय है हमें लोकसाहित्य जैसे गीत, लोक कथाएं, लोकगाथाएं इत्यिादी को संग्रहित करना होगा। दूसरा युवाओं में,युवतियों में लोक साहित्य के प्रति लगाव पैदा करना होगा ताकि प्रतियोगिता के युग में हम अपनी जमीन से दूर ना हो।
नवल ङ्क्षसह- हरियाणा के बारे में कहा जाता रहा है कि यहां कल्चर के नाम पर सिर्फ एग्रीकल्चर है, इसे आप ने इसे झुठला कर लोकसाहित्य को नए आयाम दिए है। पर आज आप साहित्य सृजन को किस स्थिती में देखते हैं?
ओमप्रकाश कादयान- आज स्थिति चिन्तादायक तो है पर सुखद भी कही जा सकती है। नवल जी आज हरियाणा में दर्जनों साहित्यकार हरियाणवी बोली को लेखन का माध्यम बना रहे हैं। कालजयी साहित्य रचा जा रहा हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी और हरियाणा ग्रन्थ अकादमी के प्रयास भी सराहनीय है। निरन्तर लेखन से हरियाणवी बोली का स्वरूप हरियाणवी भाषा के रूप में निखरने लगा है। इस बीच कुछ हल्का साहित्य है जिससे हरियाणवी बोली की छवि बिगड़ती है इसे छोड़ कर रचानत्मक,समद्ध साहित्य लेखन की ओर साहित्यकारों को बढऩा होगा। 
नवल सिंह- भविष्य की पौध कहे जाने वाले विश्वविद्यालयों को हरियाणवी संस्कृति या लोक साहित्य को प्रकाश में लाने में या कहे तो शोधकार्य करवाने की क्या भूमिका रही हैं? हरियाणा में इसे आप किस रूप में देखते है?
ओमप्रकाश कादयान- हरियाणा के विश्वविद्यालयों के प्रयास नाकाफी रहे है ऐसा मेरा मानना है। कारण रहा कि कई विभागों के शिक्षक प्रदेश से बाहर के रहे,इसी आधारभूत कारण में उन्होंने शोध कार्य ना के बराबर करवाएं। पर हम यहां सकारत्मक योगदान की बात करे तो डॉ.जयभगवान गोयल (कु.वि.कु.) भीम सिंह मलिक (कु.वि.कु.) डॉ पूर्णचन्द शर्मा (म.द.वि.) जैसे कुछ ही प्रोफेसर या प्राध्यापक थे जिन्होंने लोक साहित्य पर विशेष ध्यान दिया। दीर्घ उपेक्षा उपरान्त कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागध्यक्ष डॉ.लालचन्द गुप्त मंगल, प्रो.बाबूराम ने शोधकार्य करवाए, पाठ्य पुस्तकों का सम्पादन किया वह सराहनीय है। डॉ. महासिंह पूनिया ने धरोहर के माध्यम से बहूत बड़ा काम किया है। विश्वविद्यालय की पत्रिका सम्भावना को दूरदृष्टि से देखा जाना चाहिए। महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय हरियाणा अध्यन्न केन्द्र के निदेशक एवं लोक प्रशासन विभाग के प्रो.एस.एस.चाहर 2010 से लगातार जनरल ऑफ प्यूपल एण्ड सोसाइटी ऑफ हरियाणा निकालकर महत्वपूर्ण योगदान दे रहे है। हकृवि हिसार द्वारा हरियाणवी भाषा व लोक कला पर केन्द्रित एम.ए.डिप्लोमा अच्छा प्रयास है। पर ये प्रयास पहले होते तो आज और भी सार्थक परिणाम होते। 
नवल ङ्क्षसह- आपने बताया कि आज दर्जनों साहित्यकार साहित्य संस्कृति पर बेहतर लिख रहे, पाठकों को उनके बारे में बताए जो इस साधना में लगे है?
ओमप्रकाश कादयान-जैसे मैने पूर्व में कहा है कि आज साहित्यकार गुणात्मक साहित्य का संजृन कर रहे है जिसमें बात करे तो डॉ.पूर्ण चन्द शर्मा, डॉ.जयनारायण कौशिक, राजकिशन नैन, रणबीर सिंह, रामफल चहल, डॉ.श्याम सखा श्याम, डॉ.लालचन्द गुप्त मंगल, डॉ.बाबूराम, डॉ.महासिंह पूनिया, डॉ.रामनिवास मानव, भारत भूषण सांघीवाल, राजबीर देसवाल, डॉ.सन्तराम देसवाल, डॉ.विश्वबन्धु शर्मा, रोहित यादव, मदन गोपाल शास्त्री, डॉ.सुधीर शर्मा, जगबीर राठी, सत्यवीर नाहडिय़ा, हलचल हरियाणवी, मास्टर महेन्द्र, आलोक भाण्डोरिया, सुरेश जांगिड़, हरिकृष्ण द्विवेदी, डॉ.सुमन कादयान, डॉ.लक्ष्मण सिंह, रामफल खटकड़, रामधारी खटकड़, शमीम शर्मा, रामफल गौड़, डॉ.सुभाष, रामकुमार आत्रेय, डॉ.सावित्री वशिष्ठ, डॉ.राजबीर धनखड़, सुमेर चन्द, भगवान सिंह अहलावत, नरेन्द्र अत्री आदि लोकसंस्कृति लेखक, कवि अपने स्तर पर प्रयासरत हैं। 
नवल सिंह- नवोदित साहित्यकारों को,पाठकों को क्या सन्देश देना चाहते है?
ओमप्रकाश कादयान- हमारे आस-पास एक जीवन है कला-संस्कृति का जिसे हम पहचान कर जीने लगे तो तमाम तरह के तनाव से हमें मुक्ति मिल जाऐगी पर हम जंगल के मृग की भांति  कस्तुरी लिए संगुन्ध की तलाश में भटकते रहते है। नवोदित साहित्यकारों को चाहिए की हल्के,अश£ील जैसे जल्द प्रसिद्धी के लेखक को छोड़कर कर कालजयी साहित्य को रचे यह मुश्किल जरूर है पर यही है जिससे चिरकाल तक उनका नाम साहित्य की दूनियां को प्रकाशित करता रहेगा। पाठक, पं्रशसकों से भी अनुरोध है कि वो किसी भी साहित्यिक विद्या पर अपनी प्रतिक्रिया से साहित्यकार को कलाकार को अवश्य परिचित करवाए जिससे उन्हें भी उम्दा संजृन में मदद मिले। (नवल सिंह, प्रैसवार्ता)

No comments