दिल्ली विधानसभा चुनाव उपरांत लेगी हरियाणवी राजनीति करवट

सिरसा(प्रैसवार्ता)। लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव में राजनीतिक झटका खा चुकी कांग्रेस व इनैलो दिल्ली विधानसभा चुनाव उपरांत नई राजनीतिक करवट लेने की तैयारी में जुट गई है। भाजपा को विधानसभा चुनाव की सेंधमारी से कांग्रेस और इनैलो में घबराहट तो जरूर है, मगर स्थानीय निकाय चुनावों की मौजूदा राजनीतिक तस्वीर भी बैचेनी बढ़ाए हुए है, क्योंकि भाजपा का सेंधमारी अभियान स्थानीय निकाय चुनावों में जारी रहेगा। कांग्रेस तथा इनैलो से अलविदाई लेने वाले राजसी दिग्गजों ने भाजपाई ध्वज तो उठा लिया, मगर भाजपाई रंग-ढंग उन्हें निराशा दिए हुए है। हरियाणा की सीमा से सटी देश की राजधानी दिल्ली में अगले मास होने वाले विधानसभा चुनाव परिणाम हरियाणवी राजनीति को जरूर प्रभावित करेंगे, ऐसा राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है। यदि दिल्ली चुनाव में कांग्रेसी ग्राफ गिरता है, तो हरियणा भी इससे अछूता नहीं रहेगा। आस्था तथा हृदय परिवर्तन हरियाणवी राजसी  दिग्गजों के लिए सामान्य बात है। सत्तारूढ़ भाजपा को चेहरे चाहिए और चेहरों को भाजपाई ध्वज ऐसी राजनीतिक स्थिति बन रही है। दिल्ली चुनाव परिणाम हरियाणा में राजनीतिक भगदड़  जरूर मचाएंगे, मगर भाजपाई ध्वज उठाने वालों की भाजपा में स्थिति सोच में बदलाव भी ला सकती है। लोकसभा तथा हरियाणा विधानसभा के नतीजों ने कांग्रेस तथा इनैलो को दिए राजनीतिक घाव अभी सहलाये जा रहे है, क्योंकि घाव भरने में एक लंबा इंतजार करना पड़ेगा। हरियाणा में कांग्रेस आपसी कलह का शिकार है, वहीं इनैलो के पास चुप्पी साधने के अतिरिक्त कोई चारा नजर नहीं आता। कांग्रेस तथा इनैलो प्रदेश में किसी बड़े किसान आंदोलन या कर्मचारी डुगडुगी का इंतजार कर रहे है, क्योंकि किसान और कर्मचारी पर भावी रणनीति का मैदान तैयार किया जा सके। कर्मचारी सरकारी कार्यप्रणाली से खफा है और किसान खाद की किल्लत, नहरी पानी की कमी तथा फसलों के गिरते दामों को लेकर आंदोलन के मूड में नजर आ रहे है। हरियाणवी लंबा इंतजार नहीं करते, जिसका फायदा उठाने के लिए राजसी दिग्गज कडकती ठंड में गर्मी लाने का प्रयास कर सकते है। हरियाणा में खाद और नई जमीन अधिग्रहण नीति को लेकर किसान सड़कों पर उतर चुके है और स्वामीनाथन् आयोग की रिपोर्ट पर भी भाजपा से टकराव के मूड में है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का किसान बचाओ मुद्दा भाजपा पर भारी पड़ सकता है, क्योंकि हरियाणा में किसान का मतलब जाट से है और गैर जाट की चौधर मिलने से जाट खुश नहीं है। हरियाणवी जाट राजनीति कांग्रेस के हुड्डा और इनैलो के चौटाला के इर्द-गिर्द घूमती रही है।  चौटाला की जेल यात्रा हुड्डा के लिए लांभावित हो सकती है, जिसके लिए हुड्डा नया कार्ड खेलकर किसानों का साथ लेकर भाजपाई सरकार को कटघरे में खड़ी कर सकते है, मगर हुड्डा इसलिए चुप्पी साधे हुए है कि कांग्रेस हाईकमान उन्हें ज्यादा तवज्जों नहीं दे रहा। कांग्रेस हाईकमान हरियाणा कांग्रेस के नेतृत्व में कांग्रेसी तस्वीर का भी रूख बदल सकता है। दूसरी तरफ भाजपाई विधायक व दिग्गज भी मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की धीमी गति से खुश नजर नहीं आ रहे, क्योंकि उनकी बहुत आशाए है, जिन पर खट्टर खरा उतरने में विलम्ब कर रहे है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की रहस्यमयी चुप्पी भी कई सवालिया निशान छोड़ रही है, जो कभी भी राज्य के राजनीतिक मानचित्र में बदलाव ला सकती है। हरियाणवी राजनीति का इतिहास दर्शाता है कि प्रदेश में शासन ही प्रशासन चलाता है, जिससे अभी तक खट्टर सरकार अछूती नजर नहीं आ रही है। मौजूदा स्थिति में भाजपाई दिग्गज, विधायक व सांसद भाजपा आलाकमान के सामने मुंह खोलने का साहस नहीं जुटा पा रहे, मगर हरियाणवी नेताओं के अंदाज निराले है, क्योंकि इन्हें लंबा इंतजार भाता नहीं है। पूर्व का इतिहास इसका साक्षी है कि देवीलाल, बंसी लाल जैसे ताकतवर मुख्यमंत्रियों को भी विधायकों और जनता के सामने नतमस्तक होना पड़ा था। हरियाणा के जागरूक मतदाताओं की नजरें दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों पर है, जो राज्य की राजनीतिक को नया रूप देंगे।

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