निकाय चुनावों ने बदले पंजाब के समीकरण - The Pressvarta Trust

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Saturday, February 28, 2015

निकाय चुनावों ने बदले पंजाब के समीकरण

बठिण्डा(प्रैसवार्ता)। हाल ही में हुए पंजाब राज्य के 128 नगर कौंसिल, नगर पंचायत व नगर निगमों के चुनावों ने राज्य के राजनीतिक समीकरणों में बदलाव ला दिया है और सभी राजनीतिक दलों को आइना दिखा दिया है। राज्य में 2017 में विधानसभा चुनाव होने हैै, मगर स्थानीय निकाय के चुनावों को सैमीफाइनल माना जा रहा है। इस सैमीफाइनल ने सत्तारूढ़ अकाली-भाजपा को संकेत दे दिए है कि उन्हें मिलकर ही चुनावी दंगल में उतरना होगा, जबकि कांग्रेस को भी दर्शा दिया है कि वह निरंतर समाप्ति की ओर बढ़ रही है। भारी संख्या में निर्दलीय प्रत्याशियों की जीत से लगता है कि कांग्रेस पार्टी का कलह इसी प्रकार जारी रहेगा तथा अकाली-भाजपा की खटास समाप्त न हुर्ई, तो आम आदमी पार्टी (आप) की राजनीतिक लाटरी दिल्ली की तरह पंजाब में भी खुल सकती है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि समय कम होने के बावजूद यदि आप के चुनाव चिन्ह झाडू पर उम्मीदवार चुनावी समर में होते, तो चुनाव परिणामों का नक्शा ही बदला होता। स्थानीय निकाय चुनावों ने पंजाब के राजसी दिग्गजों को उनके क्षेत्रों की तस्वीर दिखा दी है। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा अपने गृह क्षेत्र कादियां के वार्ड नम्बर 3 में भी कांग्रेस प्रत्याशी को जीत नहीं दिलवा सके, जहां उनके परिवारजन मतदाता है। पटियाला मेें हुए दो वार्डों के चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र्र सिंह कांग्रेसी ध्वज नहीं लहरा सके, जबकि बठिण्डा में पूर्व मंत्री हरमिन्द्र सिंह जस्सी, जोकि डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के समधी है, की भी कांग्रेसी पकड़ में भारी गिरावट देखी गई है। मोगा में भी अकाली दल की आपसी फूट का कांग्र्रेस फायदा नहीं उठा पाई। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की पुत्रवधू तथा मौजूदा केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल के संसदीय क्षेत्र बठिण्डा के मानसा में मतदाताओं ने अकाली प्रत्याशियों को पराजित करके अकाली दल को राजनीतिक झटका दिया है। इसके साथ ही अकाली-भाजपा की आपसी शब्द जंग तेज हो गई है और ऐसी संभावना नजर आने लगी है कि अकाली-भाजपा में राजनीतिक तलाक कभी भी हो सकता है। स्थानीय निकाय चुनावों मेें अनेक स्थानों पर अकाली-भाजपा ने न सिर्फ आमने-सामने चुनाव लड़ा, बल्कि खुला विरोध भी किया। पठानकोट में भाजपा से अलग होकर चुनाव लडऩे वाले अकाली दल का खाता भी नहीं खुला, जबकि प्रदेश में भाजपा को भी मतदाताओं ने ज्यादा तवज्जों नहीं दी। दोआबा क्षेत्र में अकाली दल का जनाधार खिसक रहा है। प्रदेशवासियों ने स्थानीय निकाय चुनावों में अकाली दल को 29 प्रतिशत, भाजपा को 28 प्रतिशत, कांग्रेस को 22 प्रतिशत तथा 21 प्रतिशत निर्दलीयों को विजयी परचम लहराने का अवसर दिया है। निर्दलीय विजय उम्मीदवारों के प्रतिशत आंकड़े ने अकाली-भाजपा तालमेल को सोचने पर मजबूर कर दिया है, जबकि कांग्रेस को संकेत दे दिया है कि प्रदेश के राजनीतिक मानचित्र पर कांग्रेसी ध्वज ढूंढना मुश्किल हो जाएगा। निर्दलीयों के बढ़ेे आंकड़े से आम आदमी पार्टी (आप) उत्साहित है और विजयी उम्मीदवारों से संपर्क बनाने में जुट गई है। आप का मानना है कि निर्दलीय चुनाव जीतना विजयी की योग्यता का पैमाना होता है, जिस पर मतदाता विश्वास व्यक्त करते है। निकाय चुनाव परिणामें से अकाली-भाजपा सकते में है, तो कांग्रेस में मातमी धुन बज रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में अकाली-भाजपा तालमेल को मिले राजनीतिक घाव और निकाय के चुनाव परिणामों ने उन भाजपाईयों की सोच पर ग्रहण लगा दिया है, जो हरियाणा की तर्ज पर पंजाब में भाजपाई सरकार बनाने का स्वप्र संजोए हुए थे। राज्य की मौजूदा स्थिति ऐसी हो चुकी है कि अकाली दल व भाजपा से जुड़े लोगों का रूझान भी आप की तरफ बढऩे लगा है। आप की पंजाब में नशा विरोध मुहिम को भी भरपूर समर्थन मिल रहा है, जिस कारण आप के वर्करों के हौसले बुलंंद है, जबकि अकाली-भाजपा वर्करों के चेहरों पर निराशा पढ़ी जा रही है। 

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