जनता परिवार : भाजपा की बढ़ी चिंता, तो कांग्रेस आई सकते में

सिरसा(प्रैसवार्ता)। समाजवादी कुनबे ने पुराना इतिहास दोहराते हुए आधा दर्जन राजनीतिक दलों को एक मंच पर लाकर पांचवी बार प्रयास किया है। इससे पहले 1989 में राष्ट्रीय मोर्चा, 1996 में संयुक्त मोर्चा, 2008 में संयुक्त राष्ट्रीय प्रगृतिशील गठबंधन तथा 2009 में तीसरा मोर्चा बनाया जा चुका है, जो अपनी हौंद बचाए न रख सका। जनता परिवार की डुगडुगी में पांच राज्यों में प्र्रभावी दस्तक देने वाले समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी जनता पार्टी, जनता दल (यू), इनैलो तथा जनता दल (एस) शामिल हो गए है, इन सभी के कुल 15 सदस्य लोकसभा मे ंहै, जबकि राज्यसभा में सदस्यों का आंकड़ा 29 है। जनता परिवार के गठन से राष्ट्रीय राजनीतिक कैसी रहेगी, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, परंतु इस गठन ने भाजपा की चितांए बढ़ा दी है, वहीं कांंग्रेस भी सकते में आ गई है। लोकसभा में भाजपा के पास प्रचंड बहुमत है, जबकि भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पास 63 सदस्य है। राज्यसभा की 52 अन्य सीटें अन्य दलों के पास  है, जिन्हें साथ लेकर चलने की कोशिश जनता परिवार द्वारा की जानी यकीनी मानी जा रही है। कांग्रेस को यह चिंता हो गई है कि कहीं जनता परिवार आंकड़ों की बाजीगरी में उसे पीछे न  छोड़ दे। राज्यसभा में कांग्रेस की अगुवाई में यूनाईटिड प्रौगेसिव ईलाईंस(यूपीए) की 70 सीटें है। भाजपा ने देश के संभावित राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए अपनी नई रणनीति पर आंकलन शुरू कर दिया। जनता परिवार का अपने पांच राज्यों को छोड़कर दूसरे राज्यों में कोई विशेष प्रभाव नहीं, मगर जनता परिवार एक राजनीतिक संदेश देने में जरूर सफल हो जाएगा, जिसका फायदा उसे निकट भविष्य में होने वाले बिहार, यूपी और पंजाब विधानसभा चुनावों में मिलेगा। भारतीय राजनीतिक इतिहास पर नजर दौड़ाई जाए, तो पता चलेगा कि 1989 में गठित राष्ट्रीय मोर्चा में जनता दल, असम गण परिषद, तेलगु देशम पार्टी तथा द्रुमक शामिल हुए थे, मगर यह मोर्चा 1991 में ही दम तोड़ गया। 1996 में राष्ट्रीय राजनीति में संयुक्त मोर्चा दिखाई दिया, जिसमें जनता दल, तेलगु देशम पार्टी, असम गण परिषद, द्रुमक, तमिल मनीला कांग्रेस समाजवादी पार्टी तथा भाकपा ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई थी, मगर 1998 में संंयुक्त मोर्चा अपने सहयोगियों को संयुक्त नहीं रख पाया। वर्ष 2008 में जयललिता ने राष्ट्रीय प्रगृतिशील गठबंधन नामक तीसरे मोर्चे का ऐलान किया, जो प्रगृति की राह न पकड़ पाया। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देव गौडा ने वर्ष 2009 में तीसरे मोर्चे का राग अलापा, मगर राग की बांसुरी नहीं बजी। पिछले चार संयुक्त प्रयासों की हुई दुर्गति उपरांत किए जा रहे जनता परिवार के इस प्रयास पर सबकी नजरें है, जिनके पास न कोई नाम है न ही कोई निशान। जनता परिवार में विलय को लेकर समाजवादी पार्टी में गंभीर मतभेदों की सुगबुगाहट भी शुरू हो गई है। हरियाणा में भी इनैलो का एक वर्ग विलय से खफा है, मगर वह चुप्पी साधे हुए है, क्योंकि चुप्पी टूटते ही आलाकमान का खफा भय उन्हें दिखाई देता है। कांग्रेस देशभर में आपसी कलह  से पहले ही जूझ रही है और तीसरे मोर्चे की डुगडुगी कांग्रेस पर भारी पड़ेगी, जिसे लेकर कांग्रेस सकते में है। 

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