हजकां के राजनीतिक भविष्य को लेकर हजकांई सकते में

सिरसा(प्रैसवार्ता)। हिसार संसदीय चुनाव में हजकां सुप्रीमों कुलदीप बिश्रोई को अपने ही गढ़ में मिली पराजय के साथ ही राज्य में हजकां लडख़ड़ाने लगी और हजकांईयों में ''आस्था परिवर्तन" की लहर ने तेजी पकड़ ली। हजकां सुप्रीमों कुलदीप बिश्रोई ने भी अनेक बार हजकां के पदाधिकारी बदले और कुछ  को बाहर का रास्ता दिखाकर अपने जनाधार में कटौती की। लोकसभा चुनाव उपरांत हुए विधानसभा चुनाव में हजकां मिया-बीबी तक ही सिमट कर रह गई है। सुप्रीमों कुलदीप बिश्रोई आदमपुर विधानसभा क्षेत्र तथा उनकी धर्मपत्नी रेणुका बिश्रोई को हांसी विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं ने विधानसभा में पहुंचाया है। हिसार संसदीय चुनाव में जाट बनाम गैर जाट का कार्ड खूब चला, मगर इस चुनाव में गैर जाट मतदाताओं ने कुलदीप बिश्रोई पर विश्वास न कर जाट प्रत्याशी दुष्यंत चौटाला (इनैलो) का विजय परचम लहराने में पूरी-पूरी मदद की थी। राज्य में स्व. भजनलाल को गैर जााटों का नेता माना जाता रहा है, मगर उनके राजनीतिक वारिस कुलदीप बिश्रोई गैर जाटों पर अपनी पकड़  नहीं बना पाए। विधानसभा चुनाव को लगभग 6 मास बीत चुके है। इस अवधि में हजकां का ट्रैक्टर थमा हुआ है, जिसे चलाने के लिए मशीनरी में कुछ बदलाव लाना होगा ? हजकां सुप्रीमों बिश्नोई की शायद यहीं सोच होगी कि पांच वर्ष बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में मतदाता भाजपाई शासन से खफा हो जाएंगे, इनैलो धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खो बैठेगी और कांग्रेस कलह ज्यों का त्यों चलता रहेगा, ऐसी स्थिति में हजकां कुछ करिश्मा कर सकेगी ? हजकां सुप्रीमों कुलदीप बिश्रोई की रहस्यमयी राजनीति चुप्पी को देखते हुए ज्यादातर हजकांई कोप भवन में चले गए है। हरियाणा में वर्तमान किसान, कर्मचारी व जन सामान्य में मौजूदा शासन के प्रति काफी नाराजगी है, जिसे कैश करने के लिए कांग्रेस ने सक्रियता बढ़ा दी है, जबकि प्रमुख विपक्षी दल इनैलो राष्ट्रीय उड़ान का स्वप्र पाले हुए जनता परिवार की तरफ टिकटिकी लगाई हुई है। पिछले एक दशक से सत्ता से दूर इनैलो को पांच वर्ष सत्ता का इंतजार करना होगा, जिसके लिए ज्यादातर फौजी ''चश्मा" उतार चुके है। इनैलो अपनी लडख़ड़ाती राजनीतिक स्थिति से निपटने के लिए विफल नजर आती है। इनैलो की राजनीति, कांग्रेस का आपसी कलह और भाजपाई शासन से लोगों की नाराजगी के बावजूद भी हजकां की चुप्पी से संकेत मिलता है कि राज्य में कई अन्य क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों की तरह हजकां का भी अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, जिसे लेकर हजकांई सकते में है, जिनके राजनीतिक भविष्य पर भी ''ग्रहण" लगने के आसार नजर आने लगे है।

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