11 साल की मासूम युविका को चाहिए आपकी मदद

सिरसा(प्रैसवार्ता)। मुफलिसी अपने-आप में एक बीमारी है। इस बीमारी के बीच ही कोई और असाध्य बीमारी आ घेरे तो कोढ़ में खाज जैसा काम हो जाता है। कुछ ऐसी कहानी सिरसा के नोहरिया बाजार की रहने वाली युविका की है। हाल ही में पांचवीं कक्षा पास करके छठी में दाखिल हुई ग्यारह वर्षीय युविका को एक ऐसी बीमारी ने आ घेरा है जो लाखों लोगों में किसी एक को ही होती है। अपनी बच्ची युविका पर आए इस शारीरिक संकट से परिवार टूट चुका है। पहले से ही आर्थिक परेशानियों में घिरे युविका के पिता सुरेश कुमार और परिवार के अन्य सदस्यों पर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। एक तो जीबी सिंड्रोम नाम की इस बीमारी के चलते युविका के गर्दन के नीचे के शरीर ने काम करना बंद कर दिया है। अब से करीब डेढ़ महीना पहले तक भाग-दौड़ वाले सभी खेल खेलने वाली और स्कूल जाने वाली युविका ने अब बिस्तर पकड़ रखा है। बेटी की ऐसी हालत से पिता सुरेश कुमार और परिवार के अन्य सदस्य पीड़ा झेल रहे हैं। साथ ही गरीबी ने भी परेशानी बढ़ा दी है। पूरा परिवार बीमार युविका की तीमारदारी में जुटा है। कल तो जो मां अपनी बेटी को तैयार करके स्कूल भेजा करती थी अब वह सुबह से शाम तक उसकी दवा-दारू में जुटी रहती है। युविका का उपचार हिसार के जिंदल होस्पिटल में चला। वहां करीब साढ़े पांच लाख रुपया उपचार पर खर्च हो चुका है। ईलाज से 10 पैसे भी फायदा परिजनों को नजर नहीं आया है। चिकित्सकों का कहना है कि अभी दो-तीन वर्षों तक युविका अपने पैरों पर पुन: अपने पैरों पर उठ खड़े होने के लायक नहीं बन पाएगी। छोटी सी प्राइवेट नौकरी के सहारे अपने परिवार की गुजर-बसर करने वाला सुरेश नोहरिया बाजार की मस्जिद वाली गली में एक छोटे से किराए के मकान में रहता है। बेटी के हाथ पीने करने की आस में जो जमा पूंजी सुरेश ने जुटाई थी वो इस गंभीर बीमारी पर वह खर्च कर चुका है। कुछ रकम कर्ज लेकर भी ईलाज पर खर्च की है। सुरेश के लिए अब कोई सहारा नहीं है। वह सीधे-सीधे प्रशासन को भी कोसता है। उसका कहना है कि प्रशासनिक अधिकारियों ने यह कहकर उसे आर्थिक मदद देने से इंकार कर दिया कि उनके पास कोई प्रावधान नहीं है। सुरेश की आस अब दूसरे लोगों पर ही टिकी है। अपना दुख मीडिया से साझा करते हुए सुरेश ने बताया कि उसकी आर्थिक हालत ऐसी नहीं है कि वह लंबे समय तक अपनी बीमार बेटी का ईलाज करवा सके। दिल में दर्द और आंखों में बेटी की पीड़ा आंसू बनकर बह निकलती है और बेबस पिता रुंधे गले से केवल इतना ही कह पाता है कि उसे सहयोग चाहिए। चिकित्सक नरेश कुमार ने बताया कि इस बीमारी का ईलाज खर्चीला व लंबा है। करीब दो से तीन वर्षों तक ईलाज चलेगा। तब तक युविका का जीवन सामान्य हो पाएगा।

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