सुरेंद्र मिंचनाबाद के घिनौने काम से शर्मसार हुआ सिरसा

सिरसा। बड़े शहरों की लाइफ ओके पर आने वाली कहानियां सच्ची होती है, यह अब पता चला है। सिरसा जैसे छोटे शहर के तथाकथित संभ्रांत लोग किस तरह से बच्चों का बचपन छीन रहे है, यह मानव तस्करी की घटना से संबंधित है। अनाज मंडी की आढ़ती एसोसिएशन के प्रधान सुरेंद्र्र मिंचनाबाद ने जो घिनौना कार्य किया है, उससे लोगों की रूंह कांप गई है। आदिवासी बच्चों की खरीद-फरोख्त मामले में संलिप्त होकर मिंचनाबाद वाले ने देश की सभ्यता और संस्कृति को ही कालिख पोत दिया है। अब वह कह रहा है कि उसके पास अंगूठे लगे नौकरी के दस्तावेज मौजूद है। लेकिन क्या नाबालिग और आदिवासी बच्चे से नौकरी करवाने का पाप सुरेंद्र मिंचनाबाद ने नहीं किया। यह तो रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स के सब इंस्पेक्टर गजानंद शर्मा की सूझबूझ रही कि उन्होंने मानव तस्करी के इस मामले को उच्चाधिकारियों के नोटिस में देकर बाल संरक्षण अधिकारी को बुलाया और केस दर्ज हो गया। वरना अगर पुलिस की सर्तकता नहीं रहती, तो इस बच्चे का क्या हाल होना था, उसके बारे में बताने की जरूरत नहीं है।
समझदारी से काम लिया बच्चे ने
यह बच्चा काफी समझदार था। उसने जिस तरीक से पूरी कहानी तफसील से बताई, उसमें किसी को संदेह नहीं रहा। इस बच्चे ने बताया कि उसे रेलगाड़ी की आवाज सुनाई दी। उसे अंदाजा लगा कि जहां रेल रूकती है, वहां पुलिस होती है। यहीं सोचकर वह सुरेंद्र मिंचनाबाद के घर से निकला और सीधा रेलवे स्टेशन पर पहुंचा। बच्चा काफी डरा हुआ था और भूखा भी था। रेलवे के पुलिस अधिकारियों ने उसे खाना खिलाया और प्यार से सारी पूछताछ की, तो मामला शीशे की तरह साफ होता गया।
समाजसेवी कहलाते है, शर्म नहीं आती
सुरेंद्र मिंचनाबाद प्रतिष्ठित आढ़ती एसोसिएशन के प्रधान पद पर है। अपने आप को समाजसेवी कहलाता है, लेकिन करतूते? ऐसे लोग ईश्वर के कोप तक से नहीं डऱते। यह बच्चा बता रहा था कि सुरेंंद्र और उसे दोस्त रात को दारू पीते थे और मुर्गे खाते थे। उसके मांस के बर्तन धुलवाते थे और खाने को भरपेट रोटी तक नहीं देते थे। यह बच्चा पश्चिम बंंगाल जैसे गरीब प्रदेश का आदिवासी बालक है। देश के मूलनिवासी वर्ग के बच्चे के साथ घिनौनी हरकत करने वाले को समाजसेवी कहलाते हुए शर्म नहीं आती। मानवता ऐसे लोगों से गधे के सिंग से सींग की तरह गायब हो गई है। पैसे की चकाचौंध में इस हद दर्जे तक गिर जाते है लोग कि कुदरत के कानून से भी भय नहीं खाते।

No comments