स्वतंत्रता के नाम पर महिलाओं का शोषण

सिरसा(प्रैसवार्ता)। स्वतंत्रता के 68 वर्ष बीत जाने उपरांत भी भारतीय महिलाओं की स्थिति सुधारने की जगह बिगड़ी है। स्वतंत्रता से पूर्व, जहां महिलाओं को श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता था, वहीं पर वर्तमान में भोगवादी विचारधारा के पनपने की वजह से महिला को एक परोसने वाली वस्तु तुल्य समझा जा रहा है। 68 वर्षों से महिलाओं का स्वतंत्रता के नाम पर शोषण ही हो रहा है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में बाजार में वस्तुओं की बिक्री के नाम पर महिलाओं के अर्धनग्र विज्ञापन दर्शाए जा रहे है।  कई बार महिला संगठनों ने महिला को अधिक खुला माहौल देने पर चर्चा तो की है, मगर वह खुलापन विचारों की स्वतंत्रता न होकर, शर्म व लोकलाज, जो भारतीय नारी का गहना है, उसको त्यागकर नग्रता व अभ्रदता का पोषक बन जाता है, जिसका कुछ लोग लाभ उठाते है। इस प्रकार महिलाओं के प्रति शोषण का आंकड़ा बढ़ता है। महिलाओं के खुलेपन के कारण ही अक्सर महिलाएं कहीं न कहीं शारीरिक रूप से शोषण का शिकार बन जाती है या फिर इस आधुनिकता की अंधी दौड़  व चमक-दमक में दहेज लोभियों के चुंगल में फंसकर न सिर्फ शारीरिक शोषण की चपेट में आती है, बल्कि आर्थिक क्षति भी उठाती है। देश की स्वतंत्रता से पूर्व दहेज लेना व देना लड़की को कुछ सुविधाएं देने समान था, मगर वर्तमान में दहेज लेना और देना सामाजिक प्रतिष्ठा बन गया है। देशभर के पुरूष और महिलाओं के इस सामाजिक बुराई के लिए किए गए प्रयास और शासन द्वारा कानून में किए गए बदलाव के उपरांत भी महिलाओं पर अत्याचार बढ़े है। इन अत्याचारों में दहेज हत्या अव्वल नंबर पर रही है। वर्ष 1995 से लेकर 2014 के बीच दो दशक में 1,69,363 वधुए दहेज की भेंट चढ़ी है, जो भारतीयों की मानसिकता दर्शाता है। वर्ष 1995 में 4648 दहेज हत्याएं हुई थी, जो वर्ष 2014 में 9216 दोगुन्ना हो गई है। कानून का संशोधन भी दहेज लोभियों को भय नहीं दिखा पा रहा। महिलाओं के प्रति दूसरा अपराध रेप है। निर्भया कांड सरकार ने लंबे चौड़े दावे किए, मगर अपराधी वर्ग ने उन सभी दावों की हवा निकाल दी। वर्ष 2000 से लेकर 2014 तक 3,19,212 रेप के मामले पूरे देश में दर्ज किए गए, जबकि वर्ष 2000 में यह आंकड़ा मात्र 16496 था। केवल इतना ही नहीं रेप उपरांत हत्या के मामलों का भी बढ़ता हुआ आंकड़ा दर्शाता है कि भारत में स्वतंत्रता उपरांत भी महिलाओं को किस दृष्टि से देखा जाता है।

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