हरियाणा में हुड्डा पर भारी पड़ रहे है अशोक तंवर

सिरसा(प्रैसवार्ता)। हरियाणा राजनीति तेजी से करवट ले रही है। सत्तारूढ़ भाजपा से लोग खफा है, क्योंकि वह उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने में पूर्णयता असफल रही है, जबकि प्रमुख विपक्षी दल इनैलो की उपस्थिति कभी-कभी नजर आती है। हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) कोप भवन में चली गई है। आम आदमी पार्टी (आप) के झाडू के तिनके बिखर चुके है। कांग्रेस आपसी कलह के बावजूद भी सक्रिय है। पार्टी के प्रधान अशोक तंवर ने पार्टी को संगठित करने के लिए दिन-रात एक किया हुआ है, तो पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी सक्रिय है। तंवर को मिल रहे समर्थन ने हुड्डा को पीछे छोड़ दिया है। तंवर के संपर्क में वह कांग्रेसी दिग्गज है, जिन्होंने हुड्डा की बदौलत कांग्रेस से अलविदाई ली थी या फिर निष्क्रिय हो गए थे। हुड्डा ने अपने एक दशक के मुख्यमंत्री काल में सिर उठाने वाले कांग्रेसी दिग्गजों को ऐसे राजनीतिक झटके दिए, कि वह सिर उठाने योग्य नहीं रहे। पूर्व मुख्यमंत्री स्व. भजन लाल तथा मौजूदा केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह डूमरखां ऐसे चेहरे है, जिन्हें हुड्डा ने सबसे ज्यादा राजनीतिक झटके देकर कांग्रेस छोडऩे पर मजबूर किया था। हुड्डा ने प्रदेश में अपनी कांग्रेस पार्टी तैयार कर ली। राज्य के सभी 90 विधानसभा क्षेत्रों में हुड्डा समर्थक है। एक मात्र  कांग्रेसी सांसद तथा 15 कांग्रेसी विधायकों में से 14 हुड्डा के साथ है। इसके बावजूद भी वह तंवर को राजनीतिक पटकनी नहीं दे पा रहे, जबकि तंवर निरंतर तेजी से आगे बढ़ रहे है। हुड्डा ने प्र्रदेशभर में अपने समर्थक बनाए और उन्हें लूट-खसूट का खुला आशीर्वाद भी दिया, मगर हुड्डा समर्थक अपने साथ लोगों को जोड़ नहीं पाए, बल्कि लूट खसूट का बाजार गर्म करके अपने करीबियों को भी दूर कर दिया, जिसका राजनीतिक लाभ तंवर को मिल रहा है। हरियाणा के 75 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस को पराजय का मुंह देखना पड़ा था, जिसके लिए हुड्डा को जिम्मेवार ठहराया जाना किसी हद तक सही कहा जा सकता है, क्योंकि कांग्रेस सुप्रीमों सोनिया गांधी का अपनी चापलूसी की बदौलत हुड्डा को आशीर्वाद हासिल था, मगर राज्य में कांग्रेस की दुर्गति और राजनीतिक आइने ने कांग्रेस हाइकमान को दर्शा दिया कि हरियाणा में कांग्रेस की मजबूती के लिए चापलूसी से कहीं ज्यादा परिश्रम की जरूरत है, जिसके लिए तंवर सक्षम कहे जा सकते है। तंवर एक युवा चेहरा दलित समाज में मजबूत पकड़ रखने के साथ साथ सभी वर्गों को अपने साथ जोड़ रहे है, वहीं हुड्डा जाट कार्ड थामे हुए है, जिनका इस्तेमाल अक्सर वह अपने मुख्यमंत्री काल में करते है। राज्य का गैर जाट हुड्डा की बजाए तंवर को तव्वजों देता दिखाई दे रहा है। राज्य का राजनीतिक मानचित्र दर्शाता है कि तंवर का जनाधार तेजी से बढ़ रहा है, जबकि हुड्डा राजनीतिक रूप से पिछड़ रहे है।

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