कांग्रेस और इनैलो ही नजर आएगी पंचायती चौधर की जंग में

सिरसा(प्रैसवार्ता)। हरियाणा में पंचायती राज चुनाव-2015 की डुगडुगी बजते ही जिलाभर में कांग्रेस तथा इनैलो की राजनीतिक गतिविधियां बढ़ गई है, जबकि सत्तारूढ़ भाजपा भी कांग्रेस-इनैलो की इस जंग में उपस्थिति दर्ज करवाने का प्रयास करेगी। हजकां की इस जिला में कोई विशेष पहचान नहीं है। संसदीय क्षेत्र तथा पांचों विधानसभा क्षेत्रों में इनैलो का कब्जा है और जिला परिषद की कमान भी इनैलो के पास रही है। यह चुनाव, जहां भाजपा के लिए एक चुनौती है, वहीं कांग्रेस कलह के चलते कांग्रेसी डगर भी हिचकोलेे ले रही है, जबकि इनैलो उत्साहित है। दस माह के शासन काल में भाजपा ने प्रदेश के सभी वर्गों में नाराजगी पैदा कर दी है, जिसका खामियाजा चुनावी चौधर के लिए भाजपा को भुगतना होगा। 11 वर्ष से सत्ता से दूर रही इनैलो का सिरसा में व्यापक प्रभाव है, जिसमें सेंधमारी करना भाजपा के लिए आसान नहीं है। कांग्रेसी कलह का जिला सिरसा में कोई असर दिखाई नहीं देता, क्योंकि इस क्षेत्र के पूर्व सांसद अशोक तंवर  पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष है, जबकि हुड्डा ग्रूप का इस जिला में कोई आधार नहीं है। सत्तारूढ़ भाजपा को किसानों की समस्याएं, बिजली बिलों की बढ़ौतरी, महंगाई, शैक्षणिक योग्यता जैसेे मुद्दों का सामना करना पड़ेगा, जिसे कैश करने के लिए कांग्रेस व इनैलो पूर्ण प्रयास करेगी। यह चुनाव कांग्रेस तथा इनैलो को उनके राजनीतिक भविष्य का आईना दिखाएंगे। लगातार तीसरी बार विधानसभा चुनाव में लुढ़क चुकी इनैलो को यह चुनाव संजीवनी दे सकते है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में इनैलो मजबूत है। जाट आरक्षण पर इनैलो की सक्रियता भी उसे लाभ पहुंचा सकती है, क्योंकि हरियाणा में ग्रामीण किसान को जाट ही समझा जाता है। प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका निभाने में असफल रही इनैलो पर कांग्रेस भारी पड़ सकती है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। इनैलो ने अपने दस मास के विपक्षी कार्यकाल में भाजपा को सहयोग दिया है, मगर अपने राजनीतिक भविष्य को बनाए रखने के लिए इनैलो को पूरा परिश्रम करना होगा, क्योंकि उनका मुख्य मुकाबला कांग्रेस से रहेगा। यदि कांग्रेस इनैलो से ज्यादा बढ़त ले लेती है, तो इनैलो के राजनीतिक भविष्य पर ग्रहण लग सकता है। कांग्रेस द्वारा भले ही अलग-अलग डफली बजाई गई है, मगर जनहित के मुद्दे जरूर उठाए है। इनैलो के 11 वर्ष से सत्ता से दूर रहने तथा भाजपा के दस मास के कार्यकाल में प्रदेशवासियों का रूझान कांग्रेस की तरफ बढ़ा है और उन्हें कांग्रेस में ही आशा की किरण दिखाई देती है। आपसी कलह से जूझ रही कांग्रेस का गरीब, मजदूर व दलित वर्ग में अब भी प्रभाव देखा जा सकता है। यदि कांग्रेस का आपसी कलह टूट जाए, तो दोनो धडे मिलकर चुनावी समर में उतरे, तो राज्य की राजनीति का मानचित्र बदल सकता है। प्रदेश में हजकां, भाकपा, माकपा, बसपा, आप इत्यादि छोटी-छोटी राजनीतिक दुकानें जीतने की स्थिति में कहीं नहीं जा सकती, मगर कुछ क्षेत्रों में जीत में सहायक जरूर हो सकती हैै। इसलिए कांग्रेस, इनैलो ने  इन राजनीतिक दलों से भी संपर्क के प्रयास तेज कर दिए है, जबकि सत्तारूढ़ भाजपा को भी इनसे उम्मीदें है। मौजूदा प्रांंतीय राजनीति दर्शाती है कि हरियाणा में चुनावी चौधर की इस जंग में मुख्य मुकाबला कांग्रेस तथा इनैलो के बीच ही रहेगा।

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