बच्चों में हृदय रोग का समय रहते उपचार जरूरी : डा.सुशील आजाद

करनाल(प्रैसवार्ता)। देश के प्रख्यात हृदय अस्पताल 'फोर्टिस एस्कोर्टस हार्ट इंस्टीटयूट, नई दिल्ली' में पेडियाट्रिक कार्डियोलॉजी (बाल हृदय रोग विभाग)के वरिष्ठ कंसल्टेंट डा. सुशील आजाद ने कहा कि आज भी बच्चों में जन्म के समय से ही हृदय में छेद के कई मामले सामने आते हैं, जिनका समय रहते उपचार अत्यंत आवश्यक है। ऐसे बच्चों का इलाज 3 से 6 माह में हर हाल में हो जाना चाहिए। वे करनाल के होटल लीला ग्रैंड में आयोजित पेडियाट्रिक कार्डियोलॉजी वार्ता कार्यक्रम में हरियाणा भर से आए पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे।  उन्होंने कहा कि उन्नत तकनीकों के चलन में आने के बाद अब बच्चों के हृदय में छेद के इलाज के लिए डिवाइस का इस्तेमाल किया जाता है, यानी बिना चीर फाड़ के इसे दिल में फिट कर दिया जाता है। आजकल ऐसी तकनीकें आ गई हैं जिसमें 18 से 20 सप्ताह की गर्भवती महिला के बच्चे के हृदय की जानकारी भी मिल जाती है, लेकिन प्री मेच्योर डिलिवरी की स्थिति में बच्चे के इलाज में कुछ परेशानी अवश्य आती है। उन्होंने बताया कि दिल्ली स्थित फोर्टिस एस्कोर्ट हृदय संस्थान में बच्चों के हृदय रोगों के इलाज की अत्याधुनिक मशीनें हैं। हरियाणा में बच्चों के हृदय रोगों के संबंध में जागरूकता का संचार करने और काउंसलिंग के उद्देश्य से फोर्टिस एस्कॉटर्स की ओर से करनाल के ज्ञान भूषण नर्सिंग होम में बच्चों की हृदय रोग ओपीडी शुरू की गई है, जिसमें हर महीने के तीसरे शुक्रवार को फोर्टिस एस्कॉटर्स के विशेषज्ञ बच्चों की जांच करेंगे। उन्होंने बताया कि नवजात शिशुओं व बच्चों में पैदायशी हृदय रोग के इलाज में पिछले कुछ वर्षों में बड़ी तेजी से तरक्की हुई है। उन्नत डायगनोटिस्क उपकरणों की बदौलत बच्चे के गर्भ में रहते ही उसकी बीमारी का सटीक निदान मिलने लगा है। खास बात यह है कि इसमें क्रिटिकल हृदय रोग के साथ ही जन्मे लगभग 75 प्रतिशत बच्चों को जन्म के एक साल बाद भी इलाज के जरिये जीवित रखना संभव हो गया है। इनमें से कई बच्चे लगभग सामान्य जिंदगी जी सकते हैं। इस रोग के सटीक निदान व इलाज की राह में एक बड़ी बाधा लोगों में जागरूकता का अभाव है। लोगों की जागरूकता बढऩे से कोई भी डॉक्टर उचित समय पर चिकित्सा मुहैया कराने में सक्षम हो पाएगा और सही समय से इलाज से बच्चे की आगे की जिंदगी बेहतर हो पाएगी। डा. सुशील आजाद ने कहा कि वे ज्ञान भूषण हास्पिटल में आने वाले बच्चों के इलाज के लिए अस्पताल के संचालक डा.आलोक गुप्ता को सहयोग करेंगे ताकि पेडियाट्रिक कार्डियोलॉजी में विशेषज्ञता उपलब्ध कराई जा सके। पैदायशी हृदय रोग के संबंध में पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि पैदायशी हृदय रोग वैसी स्थिति को कहा जाता है जिसमें बच्चे के जन्म के समय ही उसके हृदय में किसी तरह की गड़बड़ी पाई जाती है, हालांकि इनमे से कुछ गड़बडिय़ों का पता जन्म के समय नहीं बल्कि बाद में चल पाता है, ऐसे तकरीबन 33 से 50 प्रतिशत मामले गंभीर होते हैं और बच्चे के जन्म के पहले साल में ही उन्हें इलाज की जरूरत पड़ती है। डा. आजाद व ज्ञानभूषण अस्पताल के संचालक डा. आलोक गुप्ता ने कहा कि हृदय में छेद के इलाज के लिए किसी बाबा या देसी दवाओं के सहारे ना रहें क्योंकि इसका इलाज ऑप्रेशन ही है इसलिए समय पर इलाज कराएं ताकि परेशानियों से बचा जा सके।  डा. सुशील आजाद ने कहा कि शोध की मानें तो भारत में प्रतिवर्ष जन्मे लगभग 2.80 करोड़ बच्चे और प्रति 1000 में से 6 से 8 बच्चे पैदायशी हृदय रोग के साथ ही इस दुनिया में आते हैं। पैदायशी हृदय रोग का इलाज अब अधिक महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि उच्च अवस्थता दर और मृत्यु दर के लिए इसे सबसे अधिक जिम्मेदार कारकों में से एक माना जाने लगा है। पैदायशी हृदय रोग के लिए जीन और अन्य कारकों को भी जिम्मेदार माना जाता है जैसे पर्यावरण, मां का खानपान, मां की हृदय की स्थिति या गर्भावस्था के दौरान मां की चिकित्सा स्थिति। इस रोग के दीर्घकालीन प्रभाव का इलाज सर्जरी, कैथेटर पद्धतियों और दवाइयों से किया जाता है जबकि गंभीर मामलों में कई बार ट्रांसप्लांट भी कराना पड़ता है।

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