हुड्डा इनैलो के गढ़ मेंं और इनैलो हुड्डा के घर में

सिरसा(प्रैसवार्ता)। इनैलो के बढ़ रहे जनाधार से चिङ्क्षतत एक विशेष वर्ग का चौधरी बनने का ख्वाब देख रहे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के गढ़ में इनैलो हिंदी दिवस पर एक रैली करने जा रही है। इस रैली को लेकर हुड्डा का सकते में आना स्वाभाविक है, क्योंकि इनैलो की पहचान हरियाणवी राजनीति में रैली विशेषज्ञ के रूप में है। हुड्डा ने इनैलो के गढ़ सिरसा में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए अपने मलाईदार चहेतों को कमर कस लेने का निर्देश दिया है। कांग्रेस प्रधान अशोक तंवर के संसदीय क्षेत्र सिरसा में हुड्डा अपना प्लेटफॉर्म तैयार करने की फिराक में है। तंवर और हुड्डा का राजनीतिक छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। प्रदेश में खट्टर सरकार हुड्डा के कार्यकाल में हुए घपलों और फर्जीवाड़ों को उजागर कर रही है, तो दूसरी ओर प्रदेश में कांग्रेस की हुई दुगति को लेकर कांग्रेस आलाकमान हुड्डा को जिम्मेवार मानते हुए कोई तवज्जों नहीं दे रहा। हुड्डा समर्थकों की सोच है कि हुड्डा को नई राजनीतिक दुकान खोल लेनी चाहिए, मगर हुड्डा जानते है कि हरियाणवी राजनीति में नई दुकान को ताला लगते भी देर नहीं लगती। इसलिए वह  हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहे है। हुड्डा का प्रदेश व्यापी दौरा न तो किसानों की सुध लेने का है और न ही समस्याएं सुनने का, बल्कि पूरे प्रदेश में अपने लिए प्लेटफार्म बनाने को लेकर है। दौरे के बहाने हुड्डा अपने मलाईदार चहेतों को निर्देश दे रहेे है कि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपने साथ जोड़े, ताकि जरूरत पडऩे पर गुलाबी कांग्रेस के बैनर तले ध्वज उठा लिया जाए। हुड्डा की हर योजना कांग्रेस आलाकमान के समक्ष विफल हो रही है, वहीं एक विशेष का चौधरी बनने के स्वपन पर इनैलो ग्रहण लगाए हुए है। सिरसा जिला के पांचों विधानसभाई क्षेत्रों पर कब्जा है तथा बतौर कांग्रेस प्रत्याशी चुनावी समर में उतरे पांच में से तीन को तंवर का करीबी माना जाता है। जिला सिरसा में तंवर का प्र्रभाव काफी है, जिसमें सेंधमारी के लिए हुड्डा को कड़ी मशक्कत करनी होगी, क्योंकि मलाईदार चहेतों के पास दिखावा ज्यादा तथा लोगों का आंकड़ा लगभग शून्य कहा जा सकता है। अपने सिरसा दौर में हुड्डा क्या इनैलो या तंवर की फौज में सेंधमारी कर पाएंगे, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। इस बात से राजनीतिक पंडित इंकार नहीं करते कि जिनके सहारे हुड्डा अपना मंच बनाना चाहते है, उन्हें राजनीतिक दृष्टि में विश्वास मात्र मानना एक भारी भूल हो सकती है।

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