हरियाणा कांग्रेस में ''चौधर" की जंग से कांग्रेसी तंग


सिरसा(प्रैसवार्ता)। हरियाणा के जागरूक मतदाताओं ने लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को, जो आईना दिखाया है, लगता है कि उससे कांग्रेस ने कोई सबक नहीं लिया। प्रदेश की मौजूदा सरकार से नाराज लोग कांग्रेस की तरफ बढऩे लगे है, जो कांग्रेसियों को शायद अच्छे नहीं लगते, क्योंकि प्रदेश में दो कांग्रेसी संगठन चल रहे है। कांग्रेस हाईकमान ने हरियाणा कांग्रेस की कमान अशोक तंवर को दी हुई है, तो वहीं पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा समांतर कांग्रेस चला रहे है। एक दशक तक सत्ता में रहने वाली कांग्रेस की लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव में हुई राजनीतिक दुर्गति का ठीकरा हुड्डा पर फोड़ा जा चुका है। अपने ऊपर उठ रहे इस प्रकार के आरोप को धोने के लिए हुड्डा ने कई प्रयास व शक्ति प्रदर्शन किए है, मगर आरोप ज्यों के त्यों बने हुए है। हुड्डा ने कांग्रेस नेतृत्व पर दवाब बनाने के लिए प्रदेशभर में बैठकें कर कांग्रेसीजनों तथा प्रदेशवासियों की नब्ज टटोली और इसी के साथ ही हुड्डा के स्वपनों पर ग्रहण लग गया। प्रदेश का राजनीतिक मानचित्र देखकर हुड्डा ने 'काला कोटÓ(वकीली वेषभूषा) पहनना ही उचित समझा, मगर हुड्डा के समर्थक उलझ कर रह गए एक ऐसी उलझन में, जो उन्हें हुड्डा द्वारा दी गई। हुड्डा का सक्रिय राजनीति से दूरी बनाने से कांग्रेसी तंग होने लगे है, क्योंकि वह कांग्रेसी होते हुए भी कांग्रेसी बैठकों में नहीं जा पा रहे। ऐसी ज्यादातर बैठकों में तंवर समर्थकों की भारी भीड़ होती है, जिसमें हुड्डा समर्थक नजर नहीं आते। प्रदेश में इनैलो की सरकार बनने में बाधक बनने तथा भाजपा को सत्ता पहुंचाने का श्रेय हुड्डा को दिया जा सकता है। तंवर से राजनीतिक मतभेदों की बदौलत हुड्डा द्वारा अपनाई गई रणनीति अपनों को ही राजनीतिक झटकों से प्रदेश के जागरूक मतदाताओं ने भाजपा पर विश्वास बनाया और भाजपा की सरकार बनी। हुड्डा के क्षेत्रवाद, जातिवाद तथा विकास व नौकरियों में भेदभाव के कारण प्रदेश की जीटी रोड़ बैल्ट पर भगवा भारी रहा। कांग्रेस दिग्गजों सर्वश्री वीरेंद्र सिंह डूमरखां, सुश्री शैलजा, पूर्व सांसद ईश्वर सिंह सहित कई विधायकों ने हुड्डा सरकार पर जमकर तीर छोड़े, जिससे कांग्रेस गंभीर रूप से घायल हो गई और तीसरी बार सत्ता पर काबिज होने की बजाए तीसरे स्थान पर चली गई। उत्तरी हरियाणा से उठी राजनीतिक चिंगारी ने कांग्रेस से अलविदाई लेने वालों की लाईन लगा दी। प्रदेश कांग्रेस को मिले इस राजनीतिक जख्म से कांग्रेसी शीर्ष नेतृत्व काफी चिंतित देखा गया, जिस कारण हुड्डा के हाईकमान पर विश्वास जमाने के हर प्रयास तथा शक्ति प्रदर्शन की अनदेखी कांग्रेस आलाकमान द्वारा की गई। तंवर की सक्रियता से कांग्रेस जनाधार में जरूर वृद्धि हुई है। केवल इतना ही नहीं, हुड्डा की वजह से कांग्रेस छोडऩे वालों की वापिसी के बनते आसार तथा हुड्डा समर्थकों की हुड्डा से दूरी बनाने वालों को तंवर का गले लगाना तो कांग्रेसियों को रास आ रहा है, मगर हुड्डा शासन में मलाई खाने वाले तंग है, क्योंकि तंवर खेमा में उनकी दाल गल रही नजर नहीं आती दिखाई देती। हुड्डा की पोल खोलने की कैप्टन अजय यादव की चेतावनी से हुड्डा समर्थक सकते में आ गए है और उन्होंने भी कैप्टन यादव पर बौछार शुरू कर दी है। राज्य में कांग्रेस चौधर की लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही, मगर इसके बावजूद भी कांग्रेस का जनाधार बढऩा तंवर की कमान को कांग्रेस हित में माना जा सकता है।

No comments