हजकां के कांग्रेस में विलय को लेकर राजनीतिक चर्चाएं हुई तेज

सिरसा(प्रैसवार्ता)। ज्यों-ज्यों देशभर में कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की सक्रियता बढ़ रही है, त्यों-त्यों कांग्रेसी शैली में भी बदलाव आने लगा है। लोकसभा चुनाव परिणाम से सबक लेकर कांग्रेस की बदल रही पॉलिसी से कांग्रेस को निरंतर संजीवनी मिल रही है। बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा महागठबंधन में शामिल होकर खेला गया राजनीतिक कार्ड काफी फायदेमंद साबित हुआ है। इसी तर्ज पर कांग्रेस अगले वर्ष पंजाब, असम, पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव में चुनावी समर में उतरने की तैयारी कर रही है। पंजाब में कांग्र्र्रेस ने नेतृत्व परिवर्तन कर कैप्टन अमरेंद्र सिंह को कमान सौंपी, तो कैप्टन सिंह ने तुरंत मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के सगे भतीजे पूर्व वित्तमंत्री पंजाब मनप्रीत बादल का विकेट झपट लिया। मनप्रीत ने बादल परिवार से मतभेदों के चलते अपनी अलग पार्टी पीपीपी का गठन करके विधानसभा चुनाव लड़कर 6 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। कैप्टन सिह अब बसपा, वामपंथी दलों को भी अपने साथ मिलाकर महागठबंधन की रूपरेखा तैयार करने की राह पकड़े हुए है। कांग्रेस की इस बदलती पॉलिसी का असर हरियाणा में भी देखा जाने लगा है। हरियाणा में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा से मतभेदों के चलते स्व. भजनलाल पूर्व मुख्यमंत्री हरियाणा द्वारा हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) का गठन किया था, जिसके सुप्रीमों वर्तमान में उनके बेटे कुलदीप बिश्नोई है। हजकां का भाजपा से तालमेल था, जो विधानसभा चुनाव के समय टूट गया था और इसी के साथ ही हजकां के राजनीतिक भविष्य पर ग्रहण लग गया। विधानसभा चुनाव हजकां सुप्रीमों कुलदीप बिश्नोई और उनकी धर्मपत्नी रेणुका बिश्नोई ही विधानसभा में पहुंच पाई। प्रदेश के शीर्ष नेतृत्व द्वारा पार्टी की राजनीतिक दुर्गति के लिए भूपेंद्र हुड्डा को ही जिम्मेवार मानते हुए उनकी अनदेखी करके मौजूदा कांग्रेस प्रधान अशोक तंवर पर विश्वास जताने के चलते हजकां सुप्रीमों कुलदीप बिश्रोई पर उनके समर्थकों का दवाब निरंतर बढ़ रहा है कि वह तंवर की छत्रछाया में कांग्रेस में विलय कर दें, जिससे तंवर का राजनीतिक कद बढ़ेगा और भूपेंद्र सिंह हुड्डा को राजनीतिक झटका लगेगा। हरियाणा में हजकां को अपनी राजनीतिक दुकान तैयार करने के लिए दिक्कत आ रही है, क्योंकि हजकां सुप्रीमों कुलदीप बिश्नोई पार्टी को मजबूती नहीं दे पा रहे। वर्ष 2009 में हुए विधानसभा चुनाव में हजकां को 6 विधानसभा क्षेत्रों में विजय हासिल हुई थी, मगर उसके 5 विधायक हजकां छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए, जिससे हजकां को राजनीतिक झटका लगा और निरंतर हजकां हाशिए की तरफ जाने लगी थी, मगर इसी बीच भाजपा से समझौता करके हिसार संसदीय तथा आदमपुर विधानसभा क्षेत्र से हजकां विजयी परचम लहराने में सफल रही। हजकां में पदाधिकारियों में बदलाव से हजकां से दूरी बनाने वालों का आंकड़ा तेजी से बढऩे लगा, जिसका परिणाम वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला, जब हजकां पति-पत्नी की जीत तक ही सीमित होकर रह गई, जबकि भाजपा ने चुनाव से पूर्व ही राजनीतिक तलाक ले लिया था। हजकां समर्थकों की सोच है कि  अपनी राजनीतिक दुकान को चलाए रखना मुश्किल है, इसलिए दुकानें बंद करके कांग्रेसी ध्वज उठा लिया जाए। सूत्रों के अनुसार समर्थकों की सोच और दवाब के चलते हजकां सुप्रीमों कुलदीप बिश्रोई पार्टी का विलय करने के  लिए गंभीर हो गए है और बकायदा इस संदर्भ में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से बातचीत भी चल रही है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि हजकां सुप्रीमों के लिए कांग्रेसी ध्वज उठाना फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि कांग्रेस के पास गैर जाटों का नेतृत्व देने वाला कोई चेहरा नहीं है। प्रदेश में इससे पूर्व गैर जाटों का नेतृत्व स्व. भजन लाल करते रहे है। स्व. भजनलाल का गैर जाटों रहे प्रभाव को भुनाने के लिए कुलदीप बिश्रोई कांग्रेसी ध्वज उठाकर कितना सफल हो पाएंगे, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, मगर यह माना जा सकता है कि कांग्रेस में विलय करके बिश्रोई अपना राजनीतिक भविष्य उज्जवल देख सकते है।

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