हरियाणा में भाजपाईयों तथा गैर जाटों का हो रहा है भाजपाई शासन से मोह भंग

सिरसा(प्रैसवार्ता)। विधानसभा चुनाव में तेजी से खिल रहे कमल के फूल के मुरझाने से हरियाणा के भाजपाई शासन से भाजपाईयों तथा गैर जाटों का मोहभंग हो रहा है, जो स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा को महंगा साबित हो सकता है। पंचायती राज चुनाव में तो भाजपा गैर जाटों के वोट लेने में सफल रही है, अब धीरे-धीरे राजनीतिक तस्वीर में बदलाव आने लगा है। स्वर्णकारों की हड़ताल, कर्मचारियों की नाराजगी, जाट आरक्षण आंदोलन में हुआ हिंसक उपद्रभव से भाजपा के जनाधार में तेजी से कमी आ रही है। प्रदेश के गैर जाटों को भाजपा पक्षीय माना जाता रहा है, जबकि जाटों को इनैलो तथा कांग्रेसी। गैर जाटों की बदौलत हरियाणा में पहली बार अपने बलबूते पर सत्ता में आई भाजपा की कमान एक गैर जाट को सौंपकर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने गैर जाट वोट बैंक पर अपनी प्रभावी पकड़ बनाने की योजना तैयार की थी, मगर मौजूदा प्रदेश की राजनीति भाजपा की इस योजना पर ग्रहण लगाते दिख रही है। हरियाणवी राजनीति के विशेषज्ञों का मानना है कि हरियाणा में जाटों को आरक्षण दिए जाने के भाजपाई शासन के निर्णय को लेकर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अपने वैचारिक संगठन आरएसएस के साथ इस निर्णय के लाभ नुकसान के मंथन में जुट गया है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस उलझन में उलझता दिखाई दे रहा है कि यदि हरियाणा की तर्ज पर राजस्थान में गुर्जरों, गुजरात में पटेल तथा आंध्र प्रदेश में कप्पा वर्ग के लोग आरक्षण को लेकर आंदोलन पर उतर आए, तो उन परिस्थितियों में क्या किया जाएगा। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस सोच में भी है कि हरियाणा में आरक्षण की आड़ में एक विशेष वर्ग को फोक्स बनाए जाने के चलते उसकी राजनीतिक तौर पर कैसे भरपाई की जाए और हरियाणा विधानसभा में जाट आरक्षण बिल पास करने उपरांत गैर जाटों को भाजपा के साथ रखने की क्या रणनीति बनाई जाए। भाजपा सरकार ने जाट वर्ग को संतुष्ट करने के लिए जाट आरक्षण बिल तो पास कर दिया,मगर क्या भविष्य में होने वाले चुनावों भाजपा जाट मतदाताओं की मदद ले पाएगी, इस विषय में अभी तक संशय बना हुआ है। भाजपा के कई दिग्गजों को तो यहां तक कहना है कि हरियाणा में पिछले काफी समय से प्रदेश के कई अन्य वर्ग आरक्षण का लाभ लेने के लिए स्वयं को पिछड़ा साबित करने का प्रयास करते आ रहे है, जबकि उन्हें शायद आरक्षण की जरूरत भी नहीं है, मगर जाटों को आरक्षण दिए जाने उपरांत भाजपा का परंपरागत और गैर जाट वोट बैंक जरूर खिसक सकता है, जिसके लिए भाजपा में बेचैनी का आलम देखा जा रहा है। प्रदेश में स्थानीय  निकाय चुनाव नजदीक है,जिनमें ज्यादातर शहरी मतदाताओं की भागीदारी रहेगी, जिन्हें भाजपाई पक्षीय माना जा सकता है। स्थानीय निकाय के चुनाव परिणाम ही भाजपा को राजनीतिक आईना दिखाएंगे, ऐसा माना जा रहा है।

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