हजकां के ट्रैक्टर को हाथ देखकर लग सकते है ब्रेक

(ट्रैक्टर से उतर कर हजकांई मिलाएंगे हाथ से हाथ)
सिरसा(प्रैसवार्ता)। स्वर्गीय बंसी लाल द्वारा गठित की गई हरियाणा विकास पार्टी की घर वापिसी (कांग्रेस में विलय) के बाद स्वर्गीय भजन लाल द्वारा गणित की गई क्षेत्रीय पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस की घर वापिसी के संकेत मिलने लगे है। स्वर्गीय भजनलाल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा के राजनीतिक झटकों के चलते कांग्रेस से अलविदाई लेकर नई  पार्टी हजकां का गठन किया था, मगर अब भूपेंद्र हुड्डा को कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व कोई तव्वजों नहीं दे रहा और न ही प्रदेश कांग्रेस। इस वजह से भूपेंद्र हुड्डा राजनीतिक हाशिये की तरफ तेजी से बढ़ रहे है। हजकां का मौजूदा हरियाणवी राजनीतिक मानचित्र पर कांग्रेस में विलय होना भूपेंद्र हुड्डा के लिए एक ओर गहरा राजनीतिक झटका होगा। हजकां के कांग्रेस विलय से भाजपा की तरफ देख रहे गैर जाटों की सोच में बदलाव आ सकता है, क्योंकि हरियाणा की गैर जाट कहे जाने वाली भाजपा सरकार के जाट मोह ने गैर जाटों में नाराजगी पैदा कर दी है। प्रदेश का गैर जाट मतदाता आज भी स्व. भजनलाल को अपना नेता स्वीकार करता है। भाजपा ने हजकां के गढ़ हांसी को जिला बनाने का उपहार देकर हजकां के वोट बैंक में सेंधमारी की योजना बनाई है, जिस पर अमलीजामा पहनाए जाने से पूर्व हजकां भाजपा के स्वपनों पर ग्रहण लगा सकती है। वर्तमान में हजकां सुप्रीमों कुलदीप बिश्रोई भी धर्मपत्नी रेणुका बिश्नोई हांसी की विधायिका है। भूपेंद्र हुड्डा ने वर्ष 2005 में भजनलाल परिवार को राजनीतिक झटके देकर कांग्रेस से अलविदाई के लिए मजबूर किया, तो भजनलाल ने हजकां का गठन करके वर्ष 2010 में चुनाव लड़ा और 6 विधानसभा क्षेत्रों में विजयी परचम लहराया। भूपेंद्र हुड्डा ने 6 में से 5 विजयी परचमों पर डोरे डालकर अपने  साथ मिलाकर सरकार बना ली थी। वर्तमान में राजनीतिक तौर पर हिचकौले खा रही हजकां के लिए भूपेंद्र हुड्डा के राजनीतिक झटका देने का सुनहरी अवसर है। चर्चा है कि हजकां सुप्रीमों कुलदीप बिश्नोई ने कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी से भी मुलाकात भी है और इसी मुलाकात में नए राजनीतिक समीकरणों का संकेत दे दिया है। कुलदीप बिश्रोई ने हजकां की कार्यकारिणी की बैठक बुलाई है। इस बैठक पर सभी की नजरें टिकी हुई है। इस बैठक में हजकां के राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चा होगी और हजकां की राजनीतिक दुकानदारी को बंद करने का फैसला लिया जा सकता है। यदि ऐसा होता है कि प्रदेश का पंजाबी वर्ग तथा गैर जाट कांग्रेस को मजबूती दे सकते है। हजकां गठन उपरांत दो बार विधानसभा तथा लोकसभाई चुनाव में अपना चुनावी भाग्य अजमा चुकी हजकां अपनी डगमगाती राजनीतिक नैया को लेकर हजकांई दिग्गज कांग्रेस में विलय के पक्षधर देखे जा रहे है।

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