राहुल की हुड्डा बंधुओं को तव्वजों: नेतृत्व परिवर्तन के आसार

सिरसा(प्रैसवार्ता)। हरियाणवी राजनीति को समझना राजनीतिक विशेषज्ञों की समझ से बाहर है, क्योंकि हरियाणवी राजनेताओं का आस्था व हृदय परिवर्तन से गहरा नाता है। हरियाणा के जागरूक मतदाता इससे भली-भांति वाकिफ है। हरियाणवी राजनीति का ज्ञान रखने वाले राजनीतिक पंडि़तों के मुताबिक हरियाणवी राजसी दिग्गजों के पास एक मात्र एक डंडा होता है, जिसमें किसी भी समय किसी भी राजनीतिक दल का झंडा टांग दिया जाता है। प्रदेश में कांग्रेस और समांतर कांग्रेस की तर्ज पर भाजपा चल पड़ी है। प्रदेश में करीब तीन वर्ष पूर्व अशोक तंवर को कांग्रेस की कमान सौंपी थी, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का उस समय के सांसद अशोक तंवर से राजनैतिक तौर पर छत्तीस का आंकड़ा था और यहीं छत्तीस का आंकड़े की बदौलत 40 विधानसभा क्षेत्रों में कंाग्रेसी ध्वज फहराने वाली कांग्रेस दो वर्ष पूर्व हुए चुनाव में मात्र 15 विधासनभा क्षेत्रों पर विजयी परचम लहरा पाई। भूपेंद्र हुड्डा और तंवर के इस आंकडे ने कांग्रेस को प्रदेश में ऐसे मोड़ पर ला दिया है कि कांग्रेसी दिग्गज कांग्रेस के कार्यक्रमों से परहेज करने लगे है, जबकि कुछ ने अलविदाई ले ली है। प्रदेश में कांग्रेस के हाथ से सत्ता जाते ही सत्तारुढ़ भाजपा सहित कांग्रेस के कई दिग्गजों ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा को राजनीतिक झटके देते हुए कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को विश्वास दिलाया है कि हरियाणा में कांग्रेस की दुर्गति के लिए भूपेंद्र हुड्डा ही जिम्मेवार है। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को भूपेंद्र हुड्डा द्वारा अपनी वफादारी दिखाने के प्रयास किए गए, लेकिन सफल नहीं हो सके। भूपेंद्र हुड्डा के पक्ष में 15 विधायकों में से 14, एक मात्र कांग्रेसी सांसद के अतिरिक्त दो दर्जन से ज्यादा पूर्व सांसद व विधायक देखे गए। केवल इतना ही नहीं, तीन पूर्व विधायकों ने भी कांग्रेस में शामिल होकर भूपेंद्र हुड्डा का पक्ष लिया, जिस पर तंवर की प्रतिक्रिया तंवर पर ही भारी पड़ती नजर आ रही है। आपसी ब्यानबाजी, तीखे तेवर व ल_म-ल_ की जंग तक पहुँची हरियाणा कांग्रेस ने शीर्ष नेतृत्व को सकते में ला दिया है। कांग्रेसी कलह पर मंथन उपरांत शीर्ष नेतृत्व इस निर्णय पर पहुँचा कि पार्टी हित को देखते हुए हरियाणा में नेतृत्व में बदलाव जरूरी है। वैसे भी तंवर का कार्यकाल दो मास उपरांत समाप्त हो रहा है। संभावित बदलाव को देखते हुए तंवर के तेवर बदल गए है और उन्होंने कांग्रेस के आलाकमान के प्रति नाराजगी व्यक्त करते हुए कांग्र्रेस में गुंडे जैसी भाषा का इस्तेमाल किया गया है। हरियाणा में कांग्रेस की सोच है कि कांग्रेस का जनाधार भूपेंद्र हुड्डा ही बढ़ा सकते है, क्योंकि प्रदेश का एक चौथाई वोट बैंक नेतृत्व विहीन है। भाजपा के पास ऐसा कोई प्रभावी चेहरा नहीं है, जो जाट वोट बैंक में सेंधमारी कर सके। कांग्रेस में भूपेंद्र हुड्डा की अनदेखी के चलते जाट वोट बैंक के पास इनैलो ही एक राजनीतिक मंच रह जाता है, जो स्वयं हिचकौले खा रहा है। ऐसी राजनीतिक परिस्थिति में कांग्रेस के पास भूपेंद्र हुड्डा ही एकमात्र ऐसा चेहरा है, जो जाट वोट बैंक को कांग्रेसी ध्वज के नीचे ला सकता है। तंवर अपने तीन वर्ष के कार्यकाल में कांग्रेस का न तो जनाधार बढ़ा सके और न ही कांग्रेसी कुनबा, बल्कि छत्तीस का आंकड़ा बनाए रखे हुए कांग्रेस को ल_म-ल_ की जंग तक पहुँचा दिया। इस ल_म-ल_ की कांग्रेसी जंग में तंवर ने दलित वर्ग का चौधरी बनने का दांव खेला, जिस पर भूपेंद्र हुड्डा समर्थक आधा दर्जन विधायकों ने ग्रहण लगा दिया। तंवर हजकां का कांग्रेस में विलय करवाकर श्रेय लूटने की फिराक में कहे जा सकते है, जबकि हजकां का कांग्रेसी शोरूम में शामिल होना राजनीतिक मजबूरी थी, क्योंकि  धीरे-धीरे हजकां की राजनीतिक दुकान बंद होने के कगार पर पहुँच रही थी। भूपेंद्र हुड्डा और अशोक तंवर की राजनीतिक जंग पर मंथन उपरांत कांग्रेस हाईकमान के पास हुड्डा बंधुओं को तव्वजों देना ही एकमात्र उपाय रह गया था, जो कांग्रेस का जनाधार बढ़ा सकता है। तंवर की कार्यप्रणाली के रिपोर्ट कार्ड का अध्ययन करने तथा जाट वोट बैंक को कांग्रेस के साथ जोडने के लिए कांग्रेस हाईकमान न सिर्फ प्रदेश कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन पर विचार कर रहा है, बल्कि भूपेंद्र हुड्डा किसी के समर्थक को पार्टी की कमान सौंपने पर विचार कर रहा है।

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