राहुल गांधी की उम्मीदों पर हरियाणवी कांग्रेस ने लगाया ग्रहण

सिरसा(प्रैसवार्ता)। कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की उम्मीदों पर हरियाणा कांग्रेस ने ग्रहण लगा दिया है। हरियाणवी कांग्रेस की लोकसभा चुनाव में हुई राजनीतिक दुर्गति के चलते कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने अशोक तंवर को हरियाणवी कांग्रेस का मुखिया बनाया था, मगर तीन वर्ष तक प्रधानगी पद पर रहते हुए तंवर राहुल गांधी की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाए। राहुल गांधी की सोच थी कि तंवर एक युवा चेहरे होने के साथ परिश्रमी व्यक्तित्व है, जो कांग्रेस के  खोये हुए जनाधार को वापिस लाने के साथ साथ संगठन को मजबूती देने में सक्षम कहे जा सकते है, मगर तंवर अपने प्रदेशाध्यक्ष के कार्यकाल में राहुल गांधी की सोच पर अमलीजामा पहनाने में विफल रहे। तंवर ने पूरे प्रदेश में कार्यकर्ताओं से संपर्क करके कांग्रेस को नई दिशा देने का प्रयास किया, मगर समांतर कांग्रेस चला रहे पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा के खेमे में सेंधमारी नहीं कर सके। हुड्डा और तंवर के राजनीतिक मतभेद शब्दों की जंग से बढ़कर लट्ठम लट्ठ की जंग तक पहुँच गए। प्रदेश के एक मात्र कांग्रेसी सांसद और पन्द्रह कांग्रेसी विधायकों में से चौदह भूपेंद्र हुड्डा के पक्ष में है, जिन्होंने कांग्रेस में रहते हुए कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर की बैठकों से दूरी बनाए रखी। तंवर खेमे ने भूपेंद्र हुड्डा पर कई राजनीतिक प्रहार किए और उन्हें राजनीतिक तौर पर नीचा दिखाने का प्रयास किया गया। भूपेंद्र हुड्डा अपने ऊपर हो रहे अपनों तथा बेगानों के राजनीतिक प्रहार बर्दाश्त करते रहे। राज्य की राजनीति एक समय ऐसे मोड़ पर पहुँच गई थी कि संभावना नजर आने लगी थी कि भूपेंद्र हुड्डा अपनी नई राजनीतिक दुकान खोल सकते है। अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल में कई राजसी दिग्गजों को राजनीतिक झटका देने वाले भूपेंद्र हुड्डा पर हुए राजनीतिक प्रहारों से भी वही नहीं डगमगाए। वर्तमान में भी कांग्रेसी सांसद, विधायक व पूर्व सांसद विधायकों के राजसी दिग्गजों की एक बड़ी संख्या भूपेंद्र हुड्डा को ही नेता मानते है। हरियाणवी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिले राजनीतिक झटके का ठीकरा भूपेंद्र हुड्डा के सर फोडऩे के प्रयास किए गए। यह अलग तथ्य रहा है कि ठीकरा के सर फोडऩे वाले सर पीटकर रह गए। युवा कांग्रेस के चुनाव में दो तिहाई बहुमत भूपेंद्र हुड्डा को मिलने के चलते शीर्ष नेतृत्व का नजरिया बदल गया और भूपेंद्र हुड्डा का पलड़ा फिर से भारी देखा जाने लगा। तंवर और भूपेंद्र हुड्डा के राजनीतिक मतभेदों ने कांग्रेस को भारी क्षति पहुँचाई, जिसका फायदा सत्तारूढ़ भाजपा को स्थानीय निकाय तथा पंचायती राज चुनावों में प्राप्त हुआ। हरियाणवी कांग्रेस के पास प्रदेश की जनता के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद करने के कई मुद्दे रहे, मगर एक दूसरे को झटका देने तक ही कांग्रेस सीमित होकर रह गई। किसानों की दुदर्शा, सरकारी कर्मचारियों पर लटकी तबादलों की तलवार, हिंसा रूप ले चुका जाट आरक्षण आंदोलन इत्यादि ऐसे मुद्दों को हरियाणवी कांग्रेस कैश कर सकती थी, लेकिन समांतर कांग्रेस का समर्थन तंवर को नहीं मिला। इस कारण हरियाणवी कांग्रेस को राजनीतिक क्षति हासिल हुई। भूपेंद्र हुड्डा के मुख्यमंत्री काल में उनसे दूरी बना चुके कांग्रेसी दिग्गजों पर तंवर डोरा डालकर उन्हें कांग्रेसी मंच पर ला सकते थे, मगर राहुल गांधी का करीबी होने की सोच तंवर पर भारी पड़ी। तंवर की सोच रही होगी कि भूपेंद्र हुड्डा से नाराज कांग्रेसी दिग्गज उनकी चौखट पर दस्तक देंगे। तंवर की कार्यप्रणाली से कोई भी बड़ा कांग्रेसी दिग्गज, सांसद, विधायक या पूर्व सांसद व विधायक भूपेंद्र हुड्डा को छोड़कर तंवर के साथ नहीं हुआ। तंवर के पास कई ऐसे अवसर रहें, कि वह स्वयं को हरियाणवी कांग्रेस का नेता स्थापित कर सकते थे। तंवर हुड्डा से नाराज कांग्रेसी दिग्गजों से खुद संपर्क बनाते रहे, तो हुड्डा खेेमे में खलबली मच जानी स्वाभाविक थी। तीन वर्ष के अपने प्रदेशाध्यक्ष के कार्यकाल में तंवर न तो शीर्ष नेतृत्व पर विश्वास बना सके और न ही संगठन का जनाधार बढ़ा सके। भूपेंद्र हुड्डा का जनाधार बराबर बना रहा। हरियाणवी कांग्रेस की ओर से शीर्ष नेतृत्व को दिखाए गए राजनीतिक आईने में भूपेंद्र हुड्डा का बढ़ा हुआ राजनीतिक कद स्पष्ट देखा जाने लगा है।

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