मोहब्बत की बेमिसाल कहानी दर्शाता है भागलपुर का ताजमहल

 भागलपुर का ताजमहल
अपनी पत्नी हुस्न बानों के गम में डूबे पति डॉ. नजीर आलम ने उसकी याद को तरोताजा रखने के लिए करीब 35 लाख रुपये खर्च करके भागलपुर में एक ताजमहल बनाया है, जिसे देखने वालों की भीड़ अक्सर यहां देखी जाने लगी है। करीब 57 वर्ष पूर्व डॉ. आलम का हुस्न बानों से निकाह हुआ था। चार वर्ष बाद पति-पत्नी हज की यात्रा कर लौटे थे, तब उन्होंने फैसला लिया था कि जिसकी मृत्यु पहले होगी, उसका मकबरा घर के आगे बनेगा, जोकि उसके सपनों का ताजमहल होगा। डॉ. आलम ने इस फैसले से परिवारजनों को भी अवगत करवा दिया था। वर्ष 2015 में डॉ. आलम की पत्नी का निधन हो गया और लिए गए फैसले पर अमलीजामा पहनाते हुए डॉ. आलम ने इसकी समस्त कमाई इस यादगार पर लगा दी। डॉ. आलम का कहना है कि उसके बच्चे अपनी रोजी रोटी कमाने में सक्षम है और उन्होंने इस यादगार में आर्थिक सहयोग दिया है। करीब दो वर्ष तक चले इस निर्माण कार्य से ताजमहल तो बन गया, लेकिन डॉ. आलम की आर्थिक स्थिति गड़बड़ा गई। होम्योपैथिक चिकित्सक होने के कारण डॉ. आलम की आमदनी सीमित थी और इस पर भी उन्हें अपने दस बच्चों की शिक्षा व आत्मनिर्भरता का फिक्र था, मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। डॉ. आलम के तीन बेटों और तीन बेटियों को होम्योपैथिक चिकित्सक की पढ़ाई करके आत्मनिर्भर बनाया, जबकि दो बेटों ने अपना रोजगार शुरू किया हुआ है। सांय होते ही इस मकबरे में संगमरमर का गुंबद व मीनार रोशनी से चमक उठते है, जिन्हें देखने के लिए बधाईयों का तांता लगा हुआ है और वह इस महोब्बत की अद्भूत मिसाल की सराहना करते नहीं थकते। पत्नी हुसन बानों के निधन होने उपरांत डॉ. आलम इस मकबरा का निर्माण कार्य शुरू करवाया, जो दो वर्ष के समय में बनकर तैयार हुआ। 35 लाख से बने इस मकबरे में टाईल्स, मार्बल, ग्रेनाईट पत्थर, शीशा, स्टील, लाईटिंग का जबरदस्त काम किया है, जबकि मकबरे का गुम्मद शहजंगी के हाफिज तैयब ने तैयार किया है, वहीं उसके चार मीनार के निर्माण के लिए गुजरात के कारीगर नौशाद ने अच्छी नक्काशी की है। डॉ. आलम के अनुसार उनकी इच्छा है कि पत्नी की महोब्बत को लोगों के बीच छोड़कर जाए, ताकि हमारी महोब्बत हमेशा कायम रहे। डॉ. आलम की बेटी साबरा खातून का कहना है कि मां के निधन उपरांत पिता ने कहा था कि मेरी मौत के बाद मुझे भी मां की पड़ौस में दफन कर देना, जिसके लिए जगह सुरक्षित रखी हुई है। डॉ. आलम चाहते है कि इस यादगारी मकबरे में लड़कियों की डिजीटल ढंग से पढ़ाई शुरू की जाए, जिसके लिए वह 18 मार्च 2017 से मदरसे की शुरूआत करने जा रहे है।(प्रैसवार्ता)

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