खट्टर पर आया राजनीतिक संकट समाप्त: असंतुष्टों के 'अ' पर लगा ग्रहण

मुख्यमंत्री हरियाणा
सिरसा(प्रैसवार्ता)। मुख्यमंत्री हरियाणा मनोहर लाल खट्टर ने जब से हरियाणा की बागडोर संभाली है, तभी से राजनीतिक परेशानियों से उन्हें जूझना पड़ रहा है। संकट मोचकों की कमी के चलते खट्टर ने हर परेशानी का सीधा मुकाबला किया है, मगर करीब डेढ़ दर्जन विधायकों, तीन-चार सांसदों तथा भाजपाई दिग्गजों की असंतुष्टि का 'अ' काटने के लिए खट्टर को संघ शरणम् होना पड़ा। शायद यहीं कारण रहा होगा कि खट्टर तीसरी बार भी क्लीन बोल्ड होने से बाल-बाल बच गए। असंतुष्टों की नाराजगी को लेकर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने संगठन के महामंत्री वी सतीश से फीड बैक ली और उनकी रिपोर्ट पर गहरा मंथन किया। दूसरी तरफ मनोहर लाल खट्टर ने अपनी सोच, कार्यशैली में बदलाव लाकर असंतुष्टों के 'अ' पर ग्रहण लगाने के साथ संघ के दरबार में दस्तक दी। संघ के सह-सरकार्यवाह डॉ. कृष्णा गोपाल को राज्य की राजनीति  और उनके अपनों की ओर से भाजपाई छवि को धूमिल किए जा रहे प्रयासों से अवगत करवाया। मुख्यमंत्री के दिल्ली दौरे को लेकर नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाएं बढ़ गई, मगर खट्टर की ओर से कारगुजारी से अवगत करवाने पर संघ ने संतुष्टि जताई और इसी के साथ असंतुष्टों के 'अ' पर ग्रहण लग गया। संघ ने स्पष्ट कहा कि मुख्यमंत्री अफसरशाही पर अंकुश लगाए, ताकि भाजपाई दिग्गजों की सोच में बदलाव आए और बगावती स्वरों पर विराम लग पाए। संघ के हस्तक्षेप को भांपते हुए असंतुष्टों ने चुप्पी साधना ही बेहतर समझा। फिलहाल असंतुष्टों ने अपने कदम वापिस बढ़ाने शुरू कर दिए है, जिन्हें स्थायी संतुष्टि का नाम देना एक ज्यादती होगी, क्योंकि विरोधावास ठंडा हुआ है, समाप्त नहीं। इसी के साथ खट्टर को लेकर उठा रहा नेतृत्व परिवर्तन का धुआं गायब हो गया है, बल्कि ऐसी संभावना बढ़ गई है कि नेतृत्व परिवर्तन का ध्वज पर्दे के पीछे से हिलाने वालों पर भारी पड़ सकता है। राज्य की राजनीति में भाजपाई शासन को लेकर क्यास लगाए गए। क्यास तो थम गए, लेकिन मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम संकेत दे रहा है कि नेतृत्व परिवर्तन नहीं, मंत्रीमंडल में बदलाव हो सकता है, जिसके चलते इक्का-दुक्का मंत्रीगण का विभाग बदला जाता है या फिर उन्हें पूर्व मंत्री के सम्मान से नवाजा जा सकता है।

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